🔍 प्रस्तावना:
दलाई लामा: भारत और चीन के बीच संबंध वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं — विशेषकर 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद से। अब इस कूटनीतिक उलझन में एक और संवेदनशील विषय शामिल हो गया है — दलाई लामा का उत्तराधिकार। हाल ही में चीन ने स्पष्ट रूप से कहा कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार सिर्फ चीन को है। भारत ने इसका विरोध करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता और निर्वासन में जी रहे तिब्बतियों के अधिकार का हनन बताया है। यह मुद्दा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि भारत-चीन संबंधों की नई जटिलता बनता जा रहा है।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
🧘 दलाई लामा और तिब्बती निर्वासित सरकार: पृष्ठभूमि
दलाई लामा तिब्बत के बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा धार्मिक पद है।
चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया, जिसके बाद 14वें दलाई लामा भारत आए और धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में निर्वासित तिब्बती सरकार की स्थापना हुई।
भारत ने उन्हें शरण दी और यह मुद्दा तभी से चीन की आँख की किरकिरी बना रहा है।
अब दलाई लामा की उम्र 89 वर्ष हो गई है, और उनका उत्तराधिकारी कौन होगा, यह सवाल कूटनीतिक रूप से बेहद अहम हो गया है।
🇨🇳 चीन की सख्त चेतावनी और बयान
चीन के विदेश मंत्रालय ने 11 जुलाई 2025 को बयान दिया कि “दलाई लामा का उत्तराधिकारी एक आंतरिक चीनी मामला है। इसमें भारत या कोई अन्य देश हस्तक्षेप न करे।”
चीन पहले से ही एक ‘पंचेन लामा’ खुद नियुक्त कर चुका है, जबकि असली पंचेन लामा (भारत समर्थित) को लापता कर दिया गया था।
यह आशंका है कि दलाई लामा के निधन के बाद भी चीन अपनी कठपुतली धार्मिक नेता को नियुक्त करेगा — जिससे बौद्ध समुदाय का धार्मिक अधिकार खत्म होगा।
🇮🇳 भारत की स्थिति और रणनीति
भारत ने अब तक आधिकारिक रूप से कोई आक्रामक बयान नहीं दिया, लेकिन विदेश मंत्री एस. जयशंकर की चीन यात्रा से पहले यह मुद्दा उछलना संकेत देता है कि बीजिंग भारत पर दबाव बनाना चाहता है।
भारत में तिब्बती निर्वासित समुदाय बड़ा है और दलाई लामा को भारतीय समाज व संसद का समर्थन भी मिला है।
भारत तिब्बत को लेकर सार्वजनिक रूप से ‘वन चाइना पॉलिसी’ का समर्थन नहीं करता — और यह चीन के लिए बड़ा कूटनीतिक संकेत है।
🌍 यह मुद्दा क्यों है भारत के लिए अहम?
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| धार्मिक स्वतंत्रता | भारत एक लोकतांत्रिक देश है जो धार्मिक स्वतंत्रता का समर्थन करता है। चीन की दखल इसका सीधा उल्लंघन है। |
| तिब्बत कार्ड | भारत अब तिब्बत कार्ड को चीन के खिलाफ रणनीतिक रूप से इस्तेमाल कर सकता है, जैसा कि पहले किया गया था। |
| LAC (Line of Actual Control) पर तनाव | चीन पहले से ही पूर्वी लद्दाख में आक्रामक है। यह नया मुद्दा और तनाव बढ़ा सकता है। |
| क्वाड (QUAD) और इंडो-पैसिफिक नीति | अमेरिका और जापान पहले से चीन के मानवाधिकार रिकॉर्ड की आलोचना करते हैं। भारत यदि मुखर होता है तो अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी मिल सकता है। |
🛑 क्या यह मुद्दा भारत-चीन संघर्ष को और बढ़ाएगा?
यह तय है कि दलाई लामा उत्तराधिकारी विवाद आने वाले वर्षों में भारत-चीन संबंधों का नया फ्लैशपॉइंट बन सकता है। जैसे-जैसे दलाई लामा की उम्र बढ़ रही है, यह विवाद और तीव्र होगा। यदि भारत खुलकर निर्वासित तिब्बती सरकार को समर्थन देता है, तो यह बीजिंग के लिए सीधी चुनौती होगी।
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🔚 निष्कर्ष:
दलाई लामा का उत्तराधिकार केवल धार्मिक नहीं बल्कि रणनीतिक मुद्दा बन गया है। यह भारत की विदेश नीति के लिए अग्निपरीक्षा है — जहां उसे लोकतांत्रिक मूल्यों, राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना होगा। आने वाले दिनों में एस. जयशंकर की चीन यात्रा और इस मुद्दे पर भारत की प्रतिक्रिया तय करेगी कि हम केवल मौन दर्शक रहेंगे या कूटनीति में नया अध्याय लिखेंगे।

