🔷 प्रस्तावना:
रूस और उत्तर कोरिया का बढ़ता गठबंधन: 2025 में वैश्विक राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंच रही है। अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को निरंतर समर्थन दिए जाने के चलते, रूस अब पूर्वी एशियाई देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी मज़बूत कर रहा है। सबसे बड़ा संकेतक है — रूस और उत्तर कोरिया के बीच बढ़ता सैन्य और राजनीतिक सहयोग। यह न केवल अमेरिका की वैश्विक दबदबे को चुनौती देता है, बल्कि एक नए ‘पूर्व बनाम पश्चिम’ ध्रुवीकरण की नींव भी रखता है।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
🔷 ताज़ा घटनाक्रम:
12 जुलाई 2025 तक रूस और उत्तर कोरिया ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं:
सैन्य समझौता: रूसी रक्षा मंत्री और उत्तर कोरियाई जनरल स्टाफ के बीच हथियारों और सैन्य प्रशिक्षण को लेकर द्विपक्षीय समझौता।
ऊर्जा सहयोग: रूस, उत्तर कोरिया को तेल और गैस की आपूर्ति करेगा जिससे पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद दोनों देशों को राहत मिलेगी।
अंतरिक्ष सहयोग: रूस, उत्तर कोरिया की अंतरिक्ष परियोजनाओं में तकनीकी सहयोग देगा — जो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।
🔷 इस गठबंधन के प्रमुख कारण:
1. पश्चिमी प्रतिबंधों का जवाब:
रूस पर अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भारी प्रतिबंध लगाए हैं। उत्तर कोरिया पहले से ही अलग-थलग है। ऐसे में दोनों एक दूसरे के प्राकृतिक सहयोगी बन गए हैं।
2. यूक्रेन युद्ध का प्रभाव:
यूक्रेन युद्ध ने रूस को वैश्विक मंच पर अलग-थलग किया। उत्तर कोरिया जैसे देशों से सहयोग रूस को नैतिक और रणनीतिक समर्थन देता है।
3. एंटी-वेस्टर्न नेरेटिव (Anti-Western Narrative):
दोनों देश अमेरिका और नाटो को वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा मानते हैं। इनका मानना है कि पश्चिमी ‘हस्तक्षेपकारी नीतियां’ संप्रभुता को नष्ट कर रही हैं।
🔷 वैश्विक प्रभाव:
1. एशिया में सैन्य असंतुलन:
रूस-उत्तर कोरिया गठबंधन से दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका के लिए सुरक्षा खतरा बढ़ गया है।
2. संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता पर प्रश्न:
दोनों देशों पर लगे प्रतिबंधों को खुलेआम चुनौती देना संयुक्त राष्ट्र की निर्णय क्षमता पर सवाल उठाता है।
3. चीन की भूमिका:
चीन इस गठबंधन को खुला समर्थन भले न दे, परंतु इससे उसके एशिया-प्रशांत में दबदबे को फायदा मिल सकता है।
🔷 क्या यह नया शीत युद्ध है?
यह गठबंधन पुराने ‘शीत युद्ध’ (Cold War) की याद दिलाता है, जहां अमेरिका और सोवियत संघ दो ध्रुवों में दुनिया को बाँट चुके थे। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार समीकरण त्रिकोणीय हैं – अमेरिका, रूस और चीन। उत्तर कोरिया जैसे देश इन समीकरणों को और जटिल बना रहे हैं।
🔷 भारत के लिए रणनीतिक संदेश:
भारत को गैर-पक्षपाती कूटनीति बनाए रखनी होगी, क्योंकि रूस उसका सामरिक सहयोगी है, वहीं अमेरिका और जापान उसके रणनीतिक साझेदार हैं।
भारत को Indo-Pacific क्षेत्र में स्थायित्व बनाए रखने के लिए ASEAN और QUAD जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
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🔷 निष्कर्ष:
रूस और उत्तर कोरिया का यह गठबंधन सिर्फ दो देशों के आपसी रिश्तों तक सीमित नहीं है। यह ग्लोबल पावर स्ट्रक्चर में बदलाव का संकेत है। अमेरिका और उसके सहयोगियों को अब बहुध्रुवीय दुनिया की चुनौती के लिए तैयार रहना होगा, जहां कोई भी राष्ट्र अकेले वैश्विक नियंत्रण नहीं रख पाएगा।

