🔊 प्रस्तावना:
धार्मिक आयोजन, यातायात, औद्योगिक क्षेत्र और सभागृह जैसी जगहों पर ध्वनी प्रदूषण (Noise Pollution) अब गंभीर रूप ले चुका है। भारत में लागू पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और उसके तहत वर्ष 2000 में बनाए गए ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम अब व्यवहार में अप्रासंगिक होते जा रहे हैं।
इसी पृष्ठभूमि में, 11 जुलाई 2025 को महाराष्ट्र विधानसभा में, आमदार सना मलिक-शेख ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया—“वर्तमान डेसिबल मर्यादाएं वास्तविकता से मेल नहीं खा रहीं, अब समय आ गया है इनकी समीक्षा और सुधार का।”
✍️ लेखक: रुपेश कुमार सिंह
📈 वर्तमान डेसिबल मर्यादाएं क्या हैं?
भारत सरकार द्वारा वर्ष 2000 में बनाए गए Noise Pollution Control नियमों के अनुसार:
| क्षेत्र | दिन की सीमा | रात की सीमा |
|---|---|---|
| आवासीय क्षेत्र | 55 डेसिबल | 45 डेसिबल |
| व्यावसायिक क्षेत्र | 65 डेसिबल | 55 डेसिबल |
| औद्योगिक क्षेत्र | 75 डेसिबल | 70 डेसिबल |
लेकिन अब सच्चाई यह है कि इन मर्यादाओं का नियमित उल्लंघन हो रहा है, खासकर धार्मिक कार्यक्रमों, राजनीतिक सभाओं, और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में।
🏛️ सना मलिक-शेख ने क्या उठाया मुद्दा?
आमदार सना मलिक-शेख ने विधानसभा में “धार्मिक ध्वनि प्रदूषण” पर चर्चा के दौरान यह बात प्रमुखता से उठाई कि:
वर्तमान डेसिबल लिमिट्स आज की परिस्थितियों में अप्रभावी हो चुकी हैं।
उन्होंने उदाहरण दिया कि विधानसभा सभागृह का भी डेसिबल स्तर 60 से ऊपर पहुंच चुका है, जो कि खुद नियमों का उल्लंघन है।
उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया कि पूरे महाराष्ट्र में एक व्यापक ध्वनि सर्वेक्षण किया जाए और उस आधार पर नए डेसिबल लिमिट्स के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाए।
🗣️ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की प्रतिक्रिया:
मुख्यमंत्री फडणवीस ने माना कि:
यह विषय वास्तव में गंभीर और तात्कालिक कार्रवाई योग्य है।
उन्होंने विधानसभा में सना मलिक-शेख की सिफारिशों को न्यायोचित बताते हुए यह आश्वासन दिया कि राज्य सरकार केंद्र को इस विषय में उचित संशोधित प्रस्ताव भेजेगी।
🔬 क्यों जरूरी है डेसिबल लिमिट्स में सुधार?
वास्तविकता से तालमेल नहीं: मौजूदा नियम बनाए गए थे 2000 में — जब न शहरीकरण इतना था, न ट्रैफिक इतना, और न धार्मिक या राजनीतिक ध्वनि प्रदूषण इतना अधिक।
स्वास्थ्य प्रभाव: लगातार 60+ डेसिबल का शोर सिरदर्द, नींद की कमी, रक्तचाप, मानसिक असंतुलन और बच्चों की पढ़ाई पर असर डालता है।
कानूनी अस्पष्टता: नियम केंद्र के अधीन हैं, लेकिन राज्यों के पास क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है। इससे भ्रम की स्थिति बनती है।
तकनीकी समाधान का अभाव: शहरों में कहीं भी “Noise Monitoring Devices” या AI आधारित नियंत्रण तंत्र नहीं हैं।
धार्मिक और सामाजिक विवादों का कारण: नियमों की अस्पष्टता अक्सर सामाजिक तनाव और पक्षपात के आरोपों को जन्म देती है।
📢 आगे की सिफारिशें:
राज्यव्यापी शोर सर्वेक्षण शुरू किया जाए, विशेष रूप से शहरी, धार्मिक और बाजार क्षेत्रों में।
AI और IoT आधारित Noise Monitoring Devices हर वार्ड, सार्वजनिक जगह और धार्मिक स्थलों पर लगाए जाएं।
धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के साथ सहमति से कोड ऑफ कंडक्ट बने।
नए Noise Pollution नियमों में उपलब्ध तकनीक, सामाजिक जरूरत और कानूनी संतुलन को शामिल किया जाए।
केंद्र सरकार को भेजे जाने वाले प्रस्ताव में जनहित याचिकाओं और विशेषज्ञ सुझावों को शामिल किया जाए।
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🔚 निष्कर्ष:
ध्वनी प्रदूषण अब केवल कानों की समस्या नहीं, एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है।
आमदार सना मलिक-शेख ने इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए एक प्रगतिशील दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, और मुख्यमंत्री फडणवीस का केंद्र को प्रस्ताव भेजने का आश्वासन एक सकारात्मक संकेत है।
अब देखना यह है कि क्या यह मुद्दा राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर नीतिगत कार्रवाई तक पहुंचता है, या फिर अन्य कई पर्यावरणीय मुद्दों की तरह चर्चा में ही रह जाएगा।

