🔍 प्रस्तावना:
हवाई अड्डों के पास निर्माण हटाने की तैयारी: हाल ही में एक संभावित एयर इंडिया विमान हादसे की चेतावनी ने केंद्र सरकार को बड़ा कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने 2025 के नए ड्राफ्ट नियम (Draft Rules 2025) जारी किए हैं, जिनका मकसद है—हवाई अड्डों के आसपास बने अवैध भवनों और पेड़ों को हटाना।
लेकिन इन नियमों ने न केवल पर्यावरणविदों और आम जनता के बीच चिंता पैदा की है, बल्कि विधिक और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को लेकर सवाल भी उठे हैं।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
📌 नया क्या है Draft Rules 2025 में?
नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने 5 जुलाई 2025 को नया ड्राफ्ट जारी किया है, जो कि पुराने 1994 के नियमों को हटाकर लाया गया है।
ये नियम सरकार को यह अधिकार देंगे कि वह हवाई पट्टियों के आसपास 20 किमी तक के क्षेत्र में पेड़, टावर या निर्माण कार्यों को हटा सके।
किसी भी निर्माण या पेड़ के ‘obstruction’ घोषित होने पर बिना किसी कानूनी सुनवाई के तुरंत हटाने का प्रावधान रखा गया है।
📉 सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता: यह किसकी कीमत पर?
✈️ सरकार की दलील:
उड़ान सुरक्षा सर्वोपरि है। कई छोटे हवाईअड्डों पर अवरोधों के चलते aircraft overshooting, aborted landing, या collision risks बढ़े हैं।
हाल ही में एक प्रमुख एयर इंडिया विमान की उड़ान में ऐसा खतरा सामने आया, जिससे यह फैसला जल्दी लिया गया।
⚖️ विरोध की आवाजें:
सुप्रीम कोर्ट के 2022 आदेश के विपरीत इन नियमों को बिना विस्तृत जन-परामर्श के लाया गया।
ड्राफ्ट नियमों के प्रकाशन से सिर्फ 10 दिन की सार्वजनिक प्रतिक्रिया अवधि रखी गई, जो कि अत्यंत कम मानी जा रही है।
कोई अपील तंत्र नहीं है, जिससे जनता या प्रभावित लोग न्याय नहीं पा सकेंगे।
🌳 पर्यावरण और शहरी नियोजन पर प्रभाव:
हजारों पेड़ जिनकी उम्र 30–50 साल है, कटने की संभावना है।
शहरी इलाकों में रेसिडेंशियल हाउसिंग सोसायटीज, स्कूल, और अस्पताल भी इस नियम के दायरे में आ सकते हैं।
पर्यावरणविदों का कहना है कि यह “ब्लैंकेट क्लीनअप” का प्रयास है जिसमें scientific assessment नहीं किया गया।
🧾 कानूनी विशेषज्ञों की राय:
यह नियम Natural Justice (प्राकृतिक न्याय) के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, जहाँ ‘सुनी जाने की प्रक्रिया’ (Right to be Heard) अनिवार्य होती है।
लोक प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी साफ दिख रही है।
📈 अंतरराष्ट्रीय मानकों से तुलना:
अमेरिका, यूरोप और जापान में भी एयरपोर्ट सुरक्षा के लिए Zoning Laws होते हैं लेकिन वहां:
पूरी पारदर्शिता से Master Plans बनाए जाते हैं।
मुआवज़े, पुनर्वास और तकनीकी मूल्यांकन के बाद ही कार्रवाई होती है।
भारत में इस तरह की नीतियाँ अचानक और एकतरफा तरीके से लागू की जाती हैं, जो लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ हैं।
🔮 आगे की राह:
सरकार को चाहिए कि वह विमान सुरक्षा और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन स्थापित करे।
उपग्रह इमेजिंग और AI आधारित ऑब्सट्रक्शन मैपिंग जैसी तकनीक को अपनाया जाए जिससे कार्रवाई सिर्फ ज़रूरी जगहों पर हो।
Draft Rules को लेकर 30 दिनों की सार्वजनिक परामर्श अवधि दी जाए।
किसी भी निर्माण हटाने से पहले स्थानीय निकाय, पर्यावरण प्राधिकरण और नागरिकों की सहमति अनिवार्य की जाए।
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🔑 निष्कर्ष:
“विमान सुरक्षा” किसी भी राष्ट्र के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन उसके नाम पर तानाशाही निर्णय लेना न तो लोकतांत्रिक है, न ही न्यायसंगत। एयर इंडिया क्रैश जैसी घटनाएँ जरूर चेतावनी हैं, लेकिन सुधार का रास्ता संवेदनशील और सहभागितामूलक नीति से होकर ही निकलेगा।

