महाराष्ट्र के कोयला संयंत्रों को प्रदूषण नियंत्रण तकनीक से छूट मिलने से वायु प्रदूषण में भारी वृद्धि की आशंका है। यह नीति राज्य के पर्यावरण और जनस्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकती है।
✍️ रिपोर्ट: रूपेश कुमार सिंह
2025 के मध्य में जब भारत स्वच्छ ऊर्जा की ओर अपने कदम बढ़ा रहा है, महाराष्ट्र सरकार ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसने पर्यावरणविदों और जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। राज्य के कई कोयला संयंत्रों को प्रदूषण नियंत्रण उपकरण, विशेष रूप से FGD (Flue Gas Desulfurization) लगाने से छूट दी गई है। यह छूट अब महाराष्ट्र के कोयला संयंत्रों से वायु प्रदूषण को एक नई ऊंचाई पर ले जा सकती है।
कोयला संयंत्र और FGD तकनीक: एक संक्षिप्त समझ
FGD यानी Flue Gas Desulfurization तकनीक का उपयोग बिजली संयंत्रों से निकलने वाले हानिकारक सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) को वायुमंडल में जाने से रोकने के लिए किया जाता है। भारत सरकार ने 2015 में यह अनिवार्य किया था कि कोयला आधारित ऊर्जा संयंत्र इस तकनीक को अपनाएं।
लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने 2025 में 17 में से 8 संयंत्रों को FGD लगाने से छूट दी है। इसके पीछे मुख्य तर्क है — भारी लागत और बिजली दरों पर असर। लेकिन इसका पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य पर क्या असर होगा? यही असली प्रश्न है।
नीति बनाम पर्यावरण: टकराव की जड़ें
1. सरकार का पक्ष
ऊर्जा दरों को नियंत्रित रखने के लिए यह निर्णय लिया गया है।
संयंत्रों पर पहले से ही आर्थिक दबाव है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के दिशा-निर्देशों को स्थगित किया गया है।
2. विशेषज्ञों की चेतावनी
CREA (Centre for Research on Energy and Clean Air) के एक हालिया रिपोर्ट में चेताया गया है कि यह निर्णय महाराष्ट्र के कोयला संयंत्रों से वायु प्रदूषण को “खतरनाक स्तर” तक पहुँचा सकता है।
मुंबई और आसपास के क्षेत्र पर प्रभाव
महाराष्ट्र में कई कोयला संयंत्र मुंबई, नागपुर, चंद्रपुर और नासिक जैसे शहरी या अर्ध-शहरी इलाकों के आसपास स्थित हैं। जब इन संयंत्रों से सल्फर डाइऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5) जैसे प्रदूषक वायुमंडल में जाते हैं, तो वे —
श्वसन रोगों (asthma, COPD) में इज़ाफ़ा करते हैं,
बच्चों और वृद्धों पर सीधा असर डालते हैं,
और वातावरण में अम्लीय वर्षा (acid rain) की संभावना को बढ़ाते हैं।
कोयला आधारित ऊर्जा बनाम हरित ऊर्जा
महाराष्ट्र भारत का सबसे औद्योगिक राज्य है, और इसकी ऊर्जा मांग अत्यधिक है। लेकिन यह भी सत्य है कि:
महाराष्ट्र में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं।
लेकिन राज्य का भारी निर्भरता अब भी कोयला आधारित ऊर्जा पर बनी हुई है।
इस परिदृश्य में अगर प्रदूषण नियंत्रण की अनदेखी की जाती है, तो यह नीति राज्य के दीर्घकालिक लक्ष्यों के विपरीत साबित होगी।
सार्वजनिक स्वास्थ्य पर संभावित असर
कई अध्ययन यह दर्शाते हैं कि महाराष्ट्र के कोयला संयंत्रों से वायु प्रदूषण के चलते होने वाली बीमारियों का आर्थिक बोझ सरकार और नागरिकों दोनों को उठाना पड़ता है:
भारत में वायु प्रदूषण के कारण हर वर्ष लाखों असमय मौतें होती हैं।
WHO के अनुसार, खराब हवा अब जीवन प्रत्याशा को कम कर रही है।
FGD टेक्नोलॉजी को अपनाकर इस बोझ को कम किया जा सकता था।
राज्य सरकार की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति पर प्रश्न
यह निर्णय एक बड़ा संकेत है कि महाराष्ट्र की ऊर्जा नीति दीर्घकालिक शुद्धता से अधिक अल्पकालिक लागत पर केंद्रित हो गई है। इसके परिणामस्वरूप —
केंद्र सरकार की Net Zero नीति को नुकसान हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय निवेशकों में राज्य की पर्यावरणीय छवि कमजोर हो सकती है।
उद्योगों के ESG (Environment, Social & Governance) स्कोर प्रभावित हो सकते हैं।
वैकल्पिक समाधान
1. चरणबद्ध FGD कार्यान्वयन
राज्य सरकार संयंत्रों को 3–5 वर्षों में FGD लगाने का विकल्प दे सकती है ताकि लागत धीरे-धीरे समायोजित हो।
2. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP)
FDG जैसी तकनीकों के लिए निजी निवेशकों और CSR योजनाओं का सहयोग लिया जा सकता है।
3. ग्रीन एनर्जी सब्सिडी
राज्य को सौर ऊर्जा, बायोमास या गैस आधारित संयंत्रों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष सब्सिडी स्कीम्स लानी चाहिए।
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निष्कर्ष
महाराष्ट्र के कोयला संयंत्रों से वायु प्रदूषण को नजरअंदाज करना न केवल पर्यावरणीय संकट को जन्म देगा बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य और राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डालेगा। नीति निर्माताओं को अल्पकालिक बचत से अधिक दीर्घकालिक स्थायित्व की दिशा में सोचना होगा।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन आवश्यक है। यदि यह संतुलन टूटता है, तो आने वाली पीढ़ियों को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

