प्रसंग:
‘INDIA’ गठबंधन बनाम चुनाव आयोग: 27 जून 2025 को विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ ब्लॉक (जिसमें कांग्रेस, राजद, जदयू, आप, टीएमसी आदि शामिल हैं) ने चुनाव आयोग (ECI) की एक विशेष प्रक्रिया—“Special Intensive Revision of Electoral Roll”—का कड़ा विरोध किया है। यह प्रक्रिया बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए मतदाता सूची में संशोधन से जुड़ी है।
‘INDIA’ गठबंधन ने इसे “राजनीतिक रूप से प्रेरित कदम” बताया है और आरोप लगाया है कि इससे चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
✍🏻 विश्लेषण: रुपेश कुमार सिंह
🔍 इस मुद्दे का विश्लेषण:
🧾 1. “Special Intensive Revision” क्या है?
चुनाव आयोग समय-समय पर मतदाता सूचियों की समीक्षा करता है।
लेकिन “Intensive Revision” का अर्थ होता है:
पूरे राज्य में घर-घर जाकर सत्यापन करना
नई प्रविष्टियाँ (additions) करना
मृत/डुप्लीकेट/माइग्रेटेड मतदाताओं को हटाना (deletion)
फोटो और पहचान विवरण अद्यतन करना
यह आम तौर पर हर 3 से 5 वर्षों में किया जाता है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इसका किया जाना असाधारण माना जाता है।
🗣 2. ‘INDIA’ ब्लॉक के आरोप क्या हैं?
राजनीतिक हेरफेर का आरोप:
विपक्ष का कहना है कि ये प्रक्रिया राज्य में सत्तारूढ़ NDA सरकार के इशारे पर शुरू की गई है, जिससे नया जातीय और वर्गीय संतुलन तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है।जातीय जनगणना डेटा का संदर्भ:
बिहार में 2023 की जातिगत जनगणना के बाद सामाजिक समीकरणों में भारी बदलाव आया। विपक्ष को आशंका है कि आयोग इस डेटा का प्रयोग करके कुछ जातियों को जानबूझकर अति-प्रतिनिधित्व या अंडर-रिप्रेजेंटेशन देने की तैयारी कर रहा है।समय पर सवाल:
आमतौर पर इस तरह की व्यापक प्रक्रिया 1 साल पहले की जाती है। लेकिन यहाँ केवल 3 महीने पहले शुरू की गई है, जिससे संशोधन की निष्पक्षता और व्यापकता दोनों पर सवाल उठे हैं।
🛑 3. ECI का पक्ष क्या है?
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया:
यह प्रक्रिया पूर्व निर्धारित थी, और बिहार में पुराने रिकॉर्डों में बड़ी संख्या में डुप्लीकेट या निष्क्रिय मतदाता हैं।
आयोग का दावा है कि इससे पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।
BLO (Booth Level Officers) को निर्देश दिया गया है कि किसी वैध मतदाता को हटाया नहीं जाए।
हालाँकि, आयोग ने अभी तक विपक्ष के आरोपों पर सीधे प्रतिक्रिया नहीं दी है।
🧠 4. विशेषज्ञों का विश्लेषण:
चुनावी प्रक्रियाओं के विशेषज्ञ SY Quraishi (पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त) के अनुसार:
“ऐसे सुधार यदि निष्पक्षता से हों, तो लोकतंत्र को मज़बूत करते हैं, लेकिन यदि इनके पीछे समय और प्रेरणा संदेहास्पद हो, तो यह चुनावी नैतिकता को प्रभावित कर सकते हैं।”
राजनीति विज्ञानियों का दृष्टिकोण:
विपक्ष यह मुद्दा इसलिए उठा रहा है क्योंकि बिहार में सत्ता संतुलन बेहद नाज़ुक जातीय समीकरणों पर आधारित है। यदि 1% वोट भी किसी दिशा में शिफ्ट होता है, तो सीटों का समीकरण बदल सकता है।
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🔚 निष्कर्ष: लोकतंत्र और पारदर्शिता की परीक्षा
यह विवाद यह दर्शाता है कि भारत में चुनावी प्रक्रियाएँ अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुकी हैं।
यदि मतदाता सूची संशोधन पारदर्शी नहीं हुआ, तो इससे जनता का भरोसा चुनाव आयोग पर कम हो सकता है।
दूसरी ओर, यदि विपक्ष केवल राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए इस पर शंका जता रहा है, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने जैसा कदम हो सकता है।
इस संदर्भ में, चुनाव आयोग की निष्पक्षता, पारदर्शिता, और लोकसंवाद को प्राथमिकता देना ज़रूरी हो जाता है।

