भारत द्वारा अमेरिका के लड़ाकू विमान F 35 सौदा से पीछे हटने का फैसला रणनीतिक बदलाव की ओर इशारा करता है। इस निर्णय से भारत–अमेरिका संबंधों और रक्षा नीति पर क्या असर पड़ेगा, पढ़िए विस्तार से।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
भारत ने एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और रणनीतिक निर्णय लेते हुए अमेरिका के साथ प्रस्तावित F 35 सौदा को खारिज करने के संकेत दिए। यह फैसला तब आया जब अमेरिका ने भारत से आयात पर 25% टैरिफ लागू करने की घोषणा की और रूस से ऊर्जा और हथियारों की खरीद पर “penalty” का संकेत दिया। यह घटनाक्रम न केवल भारत-अमेरिका संबंधों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि भारत की रक्षा नीति में हो रहे बदलावों का भी प्रतीक बन गया है।
F 35 सौदा क्या था?
F‑35 सौदा अमेरिकी लॉकेड मार्टिन कंपनी द्वारा निर्मित पांचवीं पीढ़ी के अत्याधुनिक मल्टीरोल लड़ाकू विमानों की खरीद का प्रस्ताव था। यह डील भारत को तकनीकी रूप से आधुनिक बनाने, चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों से मुकाबले की क्षमता बढ़ाने, और अमेरिका के साथ सामरिक गठबंधन को गहरा करने के उद्देश्य से प्रस्तावित थी।
परंतु, हाल ही में अमेरिका के नए टैरिफ और रूस से संबंधों पर कठोर रुख के चलते भारत इस सौदे से पीछे हटता दिख रहा है।
💢 अमेरिका की नाराज़गी के कारण
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 25% टैरिफ की घोषणा कर भारत की व्यापारिक छवि को प्रभावित किया।
अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से ऊर्जा और हथियारों की खरीद बंद करे, जबकि भारत की रूस पर ऐतिहासिक निर्भरता है।
F 35 सौदा अब केवल एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दबाव उपकरण बन गया है।
यह कदम अमेरिका की तरफ से “with us or against us” की नीति का हिस्सा प्रतीत होता है।
भारत की प्रतिक्रिया और आत्मनिर्भर दृष्टिकोण
भारत ने F 35 सौदा छोड़ने का जो संकेत दिया है, वह केवल अमेरिका की नाराजगी से उपजा कदम नहीं है, बल्कि इसके पीछे भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति भी है। हाल के वर्षों में भारत ने:
रक्षा क्षेत्र में FDI सीमा बढ़ाई।
घरेलू रक्षा निर्माण को बढ़ावा दिया।
HAL, DRDO और निजी कंपनियों को आधुनिक उपकरण निर्माण में शामिल किया।
भारत अब विदेशी हथियारों पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम कर ‘Make in India’ और ‘Defence Export’ पर फोकस कर रहा है।
🔄 रूस से संबंध और द्विपक्षीय संतुलन
भारत–रूस रक्षा साझेदारी दशकों पुरानी है। भारत आज भी S‑400 मिसाइल, सुखोई विमान, T‑90 टैंक जैसे प्रमुख हथियार रूस से लेता है। अमेरिका चाहता है कि भारत इन समझौतों को छोड़ दे, लेकिन भारत स्पष्ट कर चुका है कि:
उसकी रणनीतिक स्वायत्तता सर्वोपरि है।
वह किसी एक ध्रुवीय सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बन सकता।
अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत का रक्षा संबंध मल्टी-वे रहेगा, न कि एकतरफा।
🛰️ क्या विकल्प मौजूद हैं?
F 35 सौदा रद्द होने की स्थिति में भारत के पास कई विकल्प हैं:
F‑21 (Lockheed Martin का सस्ता विकल्प): भारत के अनुरूप डिज़ाइन किया गया है, लेकिन अमेरिकी तकनीक पर ही आधारित है।
राफेल (फ्रांस): पहले से भारत की वायुसेना में मौजूद है और भारत–फ्रांस संबंधों में कोई तनाव नहीं।
TEDBF और AMCA (भारत के घरेलू फाइटर जेट प्रोजेक्ट): भारत की दीर्घकालिक योजना में आत्मनिर्भर लड़ाकू विमान निर्माण।
SU-75 ‘Checkmate’ (रूस): F‑35 का ही मुकाबला करने के लिए डिज़ाइन किया गया, सस्ता और भारतीय मांगों के अनुकूल।
⚖️ रणनीतिक संतुलन की आवश्यकता
F 35 सौदा छोड़ने का फैसला जहां एक ओर भारत की आत्मनिर्भरता को बल देता है, वहीं दूसरी ओर यह सामरिक असंतुलन का खतरा भी पैदा करता है:
चीन पहले से ही J‑20 जैसे स्टेल्थ फाइटर के साथ अपनी वायु शक्ति बढ़ा रहा है।
पाकिस्तान को भी तुर्की और चीन से सैन्य सहयोग मिल रहा है।
ऐसे में भारत को तेज़ और निर्णायक निवेश करना होगा अपनी वायुसेना के आधुनिकीकरण में।
📢 राजनीतिक और कूटनीतिक संकेत
F‑35 सौदे से इनकार भारत का एक कड़ा संदेश है — “हमारी नीतियाँ दबाव में नहीं बदलेंगी।”
यह भारत के स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी की घोषणा है और वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की स्वतंत्र पहचान को दर्शाता है।
अमेरिका को यह समझना होगा कि भारत केवल मित्र नहीं, एक साझेदार है।
रक्षा सौदे अब केवल तकनीकी नहीं, कूटनीतिक सौदे बन चुके हैं।
यह भी पढ़े: UPI नियमों में बदलाव: 1 अगस्त 2025 से उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा?
🧾 निष्कर्ष:
F 35 सौदा से भारत का पीछे हटना, तात्कालिक रूप से एक बड़े हथियार सौदे की समाप्ति दिखता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह भारत की बदलती विदेश नीति, आत्मनिर्भर रक्षा नीति, और स्वतंत्र वैश्विक दृष्टिकोण का स्पष्ट प्रमाण है।
यह निर्णय भारत को दीर्घकाल में सैन्य आत्मनिर्भरता, वैश्विक संतुलन और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूती प्रदान करेगा — भले ही अमेरिका अस्थायी रूप से नाराज़ हो।

