🔹 प्रस्तावना
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश CJI डी.वाई. चंद्रचूड़, जो नवंबर 2022 से नवंबर 2024 तक CJI रहे, एक बार फिर चर्चाओं में हैं—इस बार अपने रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभों (post-retirement perks) के कारण।
हाल ही में यह रिपोर्ट सामने आई है कि वे अब भी Type-VII बंगले की बजाय VIP सुरक्षा बंगलों में रह रहे हैं, जो नियमों के विपरीत बताया जा रहा है। यह मुद्दा एक तरफ न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ा है, तो दूसरी ओर “समानता और पारदर्शिता” के सिद्धांतों पर प्रश्न भी खड़े करता है।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
🔹 रिटायरमेंट के बाद CJI को मिलने वाले लाभ
भारत में CJI पद से सेवानिवृत्त होने के बाद कुछ सीमित लाभ तय किए गए हैं:
छह महीने तक Type-VII बंगला का आवंटन (जो केंद्रीय मंत्री स्तर के लिए निर्धारित होता है)।
Z+ सुरक्षा (विशेष परिस्थिति में 5 साल तक)।
एक निजी सहायक, ड्राइवर और आदेशपाल (attendant)।
₹4,200 प्रति माह मोबाइल/संचार भत्ता।
इन सभी का उद्देश्य यह है कि पूर्व CJI को सामाजिक और सुरक्षा दृष्टिकोण से सम्मान मिले, परंतु यह स्थायी या विशेषाधिकार प्राप्त जीवन शैली का साधन न बने।
🔹 चंद्रचूड़ पर उठे प्रश्न
अब जो विवाद सामने आया है, वह इस बात को लेकर है कि पूर्व CJI चंद्रचूड़ अभी भी केंद्रीय सरकार द्वारा ‘काराजी’ (security-enclave) बंगलों में रह रहे हैं, जबकि उन्हें यह सुविधा केवल 6 महीने के लिए दी जानी थी। इसके अतिरिक्त:
वे अभी तक बंगला खाली नहीं कर पाए हैं, जबकि नियमानुसार यह समयसीमा पार हो चुकी है।
सुरक्षा मंत्रालय ने अब बंगला खाली करने का औपचारिक निर्देश जारी कर दिया है।
कुछ विशेषज्ञों और RTI कार्यकर्ताओं ने इसे “न्यायपालिका की स्वायत्तता के विरुद्ध” बताते हुए पारदर्शिता की मांग की है।
🔹 जनचर्चा और सोशल मीडिया रिएक्शन
सोशल मीडिया पर यह मुद्दा तेजी से वायरल हुआ, जहां दो राय देखने को मिली:
✅ एक वर्ग का मानना है कि पूर्व CJI जैसे उच्च पदों को विशेष सम्मान और सुरक्षा मिलनी ही चाहिए।
❌ वहीं, दूसरा वर्ग इसे “VIP कल्चर” और सामान्य नागरिकों से असमान व्यवहार के रूप में देख रहा है।
कुछ ट्वीट्स और एक्स (Twitter) पोस्ट्स में यह भी कहा गया:
“अगर न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर रहे व्यक्ति को कानून तोड़ने की छूट मिले, तो न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है?”
🔹 नीति और कानून की दृष्टि से प्रश्न
यह प्रकरण कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत सवाल उठाता है:
क्या CJI को रिटायरमेंट के बाद भी विशेष आवास की अनुमति होनी चाहिए?
क्या यह सुविधा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के खिलाफ नहीं है?
क्या सरकार को न्यायपालिका के प्रति अत्यधिक विनम्रता दिखाकर पारदर्शिता से समझौता नहीं करना चाहिए?
कई विशेषज्ञों का सुझाव है कि सभी संवैधानिक पदों के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध सुविधाएं तय होनी चाहिए, जिनका अनुपालन अनिवार्य हो।
🔹 न्यायिक गरिमा बनाम सार्वजनिक पारदर्शिता
यह तर्क दिया जाता है कि न्यायपालिका को सम्मान देना चाहिए, लेकिन यह सम्मान पारदर्शिता, समयबद्धता और समानता की शर्तों पर आधारित होना चाहिए।
अगर कोई पूर्व CJI नियमों का उल्लंघन करते हुए सरकारी सुविधा का अत्यधिक लाभ उठा रहा है, तो यह न्यायिक गरिमा के बजाय ‘विशेषाधिकारवादी मानसिकता’ को दर्शाता है।
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🔹 निष्कर्ष
पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ का यह मामला भारत में न्यायिक संस्थानों की पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए एक wake-up call है।
जरूरत इस बात की है कि:
रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं के निर्धारण और नियंत्रण की नीति को सुदृढ़ किया जाए।
हर संवैधानिक पदाधिकारी को यह दिखाना चाहिए कि वे नियमों के पालन में उदाहरण हैं।
VIP संस्कृति की जगह समाज में समानता और उत्तरदायित्व का संदेश जाना चाहिए।

