भारत में EdTech इंडस्ट्री एक नई शिक्षा क्रांति का प्रतीक बन गई है। Byju’s, Unacademy, Vedantu और Physics Wallah जैसे एजुकेशनल स्टार्टअप्स ने लाखों छात्रों तक डिजिटल शिक्षा पहुँचाई है। लेकिन जब हम इन सेवाओं की पहुँच का विश्लेषण करते हैं, तो एक बहुत बड़ा असंतुलन सामने आता है — EdTech गांवों को भुला चुका है। ग्रामीण भारत की शिक्षा प्रणाली अब भी तकनीकी सहायता और समान अवसरों से कोसों दूर है।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
शहरों में रहने वाले छात्र आज स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल व्हाइटबोर्ड, लाइव क्लासेज़ और एआई आधारित लर्निंग प्लेटफॉर्म्स से सुसज्जित हैं। उन्हें निजी मार्गदर्शन से लेकर सटीक मूल्यांकन तक की सुविधाएं उपलब्ध हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में छात्र न केवल धीमे इंटरनेट से जूझ रहे हैं, बल्कि भाषा, उपकरण और डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण वे इस डिजिटल क्रांति से पूरी तरह कटा हुआ महसूस करते हैं।
EdTech गांवों को भुला चुका है — यह कथन केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि आंकड़ों और ज़मीनी हकीकत पर आधारित विश्लेषण है।
शहरी बनाम ग्रामीण: डिजिटल विभाजन
भारत में लगभग 65% जनसंख्या गांवों में रहती है। लेकिन ज़्यादातर EdTech कंपनियां अपने बिज़नेस मॉडल को शहरी और अर्ध-शहरी छात्रों तक ही सीमित रखती हैं। कारण साफ है — भुगतान क्षमता, इंग्लिश भाषा में सहजता और तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता।
ग्रामीण भारत में मोबाइल नेटवर्क की स्थिति आज भी कमजोर है। National Family Health Survey के अनुसार, ग्रामीण भारत के 12–18 आयु वर्ग के केवल 24% छात्रों के पास ही पढ़ाई के लिए जरूरी डिजिटल डिवाइस उपलब्ध है। यही नहीं, कई क्षेत्रों में बिजली की नियमित आपूर्ति नहीं है, जिससे ऑनलाइन क्लासेज़ बाधित होती हैं।
भाषा और सामग्री की बाधाएं
भारत में एजुकेशनल स्टार्टअप्स द्वारा दी जाने वाली सामग्री प्रायः अंग्रेज़ी और कुछ हद तक हिंदी में होती है। लेकिन भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं और 100 से अधिक क्षेत्रीय भाषाएं बोली जाती हैं। ऐसे में कई छात्र शिक्षा सामग्री को समझ ही नहीं पाते।
EdTech गांवों को भुला चुका है क्योंकि इन प्लेटफॉर्म्स पर रीजनल भाषाओं में क्वालिटी कंटेंट का अभाव है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु, बंगाल या असम के छात्र अगर अंग्रेज़ी में कमज़ोर हैं, तो उनके लिए कंटेंट न के बराबर है।
तकनीकी संसाधनों तक पहुंच नहीं
शहरी छात्रों के पास हाई-स्पीड इंटरनेट, टैबलेट्स, लैपटॉप्स और डेटा प्लान होते हैं। वहीं गांवों में:
Shared मोबाइल का उपयोग होता है
डेटा की कीमत महंगी लगती है
मोबाइल नेटवर्क 3G तक सीमित होता है
कई बार स्मार्टफोन की बैटरी तक चार्ज करने में कठिनाई होती है
इन कारणों से ऑनलाइन शिक्षा उनके लिए सुलभ नहीं हो पाती।
बिजनेस मॉडल: फायदा कहां तक?
भारत के ज़्यादातर EdTech स्टार्टअप्स मुनाफा-केंद्रित हैं। वो वही सेवा देते हैं जहां से भुगतान की संभावना है। ग्रामीण भारत के छात्रों के पास उतना आर्थिक संसाधन नहीं है कि वे हजारों रुपये की सब्सक्रिप्शन फीस दे सकें। नतीजतन, ये प्लेटफॉर्म गांवों को व्यावसायिक रूप से अनाकर्षक मानते हैं।
Byju’s, Unacademy, Vedantu जैसे प्लेटफॉर्म भले ही CSR के अंतर्गत कुछ स्कॉलरशिप योजनाएं चलाते हों, लेकिन वे व्यापक स्तर पर गांवों तक नहीं पहुंचतीं। यानि EdTech गांवों को भुला चुका है, क्योंकि उसकी प्राथमिकता लाभ है, समावेशन नहीं।
सरकार की नीतियां और सीमित प्रभाव
भारत सरकार की NEP 2020 और Digital India पहल ने शिक्षा को डिजिटल बनाने की कोशिश तो की है, लेकिन इसके परिणाम अभी भी सतही हैं। ‘One Nation One Digital Platform’ जैसे प्रयासों की पहुंच सीमित है, और सरकारी स्कूलों में शिक्षक प्रशिक्षण, कंटेंट की गुणवत्ता, और तकनीकी अवसंरचना अब भी अधूरी है।
2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 60% सरकारी स्कूलों में कोई भी कंप्यूटर या डिजिटल डिवाइस नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि डिजिटल शिक्षा का सपना गांवों के लिए अब भी कोरा कागज़ है।
समाधान क्या हैं?
रीजनल भाषाओं में कंटेंट: EdTech प्लेटफॉर्म्स को चाहिए कि वे कम-से-कम 10 प्रमुख भारतीय भाषाओं में high-quality learning content उपलब्ध कराएं।
Hybrid मॉडल (ऑनलाइन + ऑफलाइन): गांवों में ऐसे Learning Kiosk बनाए जाएं जहां छात्रों को guided digital education मिल सके।
CSR और सरकार की साझेदारी: कंपनियां अपने मुनाफे का हिस्सा ग्रामीण शिक्षा पर खर्च करें — ट्रेनिंग, उपकरण और मेंटरशिप में।
ग्राम स्तर पर डिजिटल लिटरेसी अभियान: छात्रों और अभिभावकों को डिजिटल शिक्षा की उपयोगिता समझाई जाए।
कम डेटा वाले ऐप्स: हल्के व कम बैंडविड्थ में चलने वाले ऐप्स विकसित किए जाएं।
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निष्कर्ष
भारत के एजुकेशनल स्टार्टअप्स ने निश्चित रूप से शिक्षा को सुलभ और इंटरैक्टिव बनाया है, लेकिन यह सुविधा सब तक नहीं पहुँची है। ग्रामीण छात्र आज भी डिजिटल शिक्षा से वंचित हैं — EdTech गांवों को भुला चुका है, यह एक कड़वा सच है। अगर यह असंतुलन समय रहते नहीं सुधारा गया, तो भारत में डिजिटल डिवाइड एक नई सामाजिक असमानता का रूप ले लेगा।

