भूमिका:
2025 का मानसून संकट: भारत में 2025 का मानसून अब तक असामान्य और असंतुलित रूप में सामने आया है। एक ओर उत्तर और पूर्वोत्तर भारत—विशेषकर बिहार, असम और उत्तराखंड—भयंकर बाढ़ से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्य गंभीर सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हैं। 3 जुलाई 2025 को भारतीय मौसम विभाग (IMD) की ताज़ा रिपोर्ट ने इस विरोधाभासी स्थिति की पुष्टि की है।
यह परिदृश्य सिर्फ मौसम की मार नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की गहरी चेतावनी है, जिसे अब टालना भारत के लिए असंभव होता जा रहा है।
✍🏻 विश्लेषण: रुपेश कुमार सिंह
बिहार और असम में बाढ़: हर साल की त्रासदी अब स्थायी संकट
बिहार और असम पिछले दो दशकों से बाढ़ की मार झेलते आ रहे हैं। लेकिन 2025 में यह आपदा और भी विनाशकारी साबित हो रही है:
गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर।
अब तक लाखों लोग विस्थापित, फसलें बर्बाद, और जनजीवन अस्त-व्यस्त।
उत्तराखंड में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे तीर्थयात्रा और पर्यटन पर भी असर पड़ा है।
प्रश्न उठता है: क्या यह प्राकृतिक आपदा है या मानवीय लापरवाही का परिणाम?
महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में सूखा: मानसून की बेरुख़ी
वहीं दूसरी तरफ, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्र, गुजरात के कच्छ और कर्नाटक के उत्तरी हिस्से में जुलाई तक औसत से 50% कम वर्षा हुई है।
जलाशयों का जलस्तर खतरनाक रूप से कम।
किसान बोआई नहीं कर पा रहे, जिससे खरीफ फसल संकट में।
पेयजल की कमी और जलटैंकरों पर निर्भरता बढ़ी।
यह विरोधाभास भारत में ‘जलवायु दोध्रुवीयता’ (Climate Bipolarity) की स्थिति को दर्शाता है – एक देश में एक ही समय पर बाढ़ और सूखा दोनों।
जलवायु परिवर्तन: क्या यह नया सामान्य (New Normal) है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में मॉनसून पैटर्न स्थायी रूप से बदल रहे हैं।
अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में तापमान बढ़ने से चक्रवाती गतिविधियां बढ़ रही हैं।
ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, वनों की कटाई और अनियंत्रित शहरीकरण मानसून के असंतुलन के कारक हैं।
IMD और IITM की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि अगले 10 वर्षों में भारत को ‘फ्लैश फ्लड्स’ और ‘लंबे सूखे’ के दोहरे खतरे का सामना करना पड़ेगा।
आपदा प्रबंधन की विफलता: NDMA और राज्य सरकारें कितनी तैयार हैं?
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के पास नीतियाँ तो हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन की भारी कमी है।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत सामग्री देर से पहुँच रही है।
शहरी इलाकों में जल निकासी व्यवस्था पूरी तरह विफल।
सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल संरक्षण के पुराने मॉडल अब कारगर नहीं रह गए।
क्या सिर्फ आपदा के बाद राहत देना ही पर्याप्त है? या हमें पूर्व-संरचना और दीर्घकालिक रणनीति की ओर बढ़ना होगा?
जलवायु-प्रतिकूल भारत: सामाजिक और आर्थिक परिणाम
कृषि पर सीधा असर:
बाढ़ से खेत बर्बाद, सूखे से बोआई नहीं – दोहरा संकट।
खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि और ग्रामीण आय में गिरावट।
शहरी जीवन संकट में:
महानगरों में बाढ़ की घटनाएं बढ़ीं—मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में जलजमाव आम बात।
जल संकट और बिजली कटौती ने शहरी जीवन को भी प्रभावित किया।
आंतरिक पलायन में तेजी:
सूखा और बाढ़ दोनों के कारण ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन तेज हुआ है।
इससे शहरी बेरोजगारी और झुग्गियों का विस्तार भी बढ़ा है।
क्या है समाधान?
स्मार्ट जल नीति:
वर्षा जल संचयन को अनिवार्य किया जाए।
पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार।
जलवायु-उपयुक्त कृषि:
सूखा-प्रतिरोधी बीज, माइक्रो इरिगेशन और मल्टी-क्रॉपिंग को बढ़ावा देना।
पूर्व चेतावनी प्रणाली:
बाढ़ और सूखे की भविष्यवाणी के लिए रीयल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग।
राज्य-केंद्र समन्वय:
आपदा प्रबंधन में राज्य और केंद्र सरकार के बीच तालमेल बेहद जरूरी।
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निष्कर्ष:
2025 का मानसून भारत के सामने जलवायु संकट की एक स्पष्ट और भयावह तस्वीर लेकर आया है। बाढ़ और सूखे की यह दोहरी मार केवल आपदा नहीं, बल्कि सिस्टम की असफलता और भविष्य की चुनौती का संकेत है। अगर अब भी ठोस और वैज्ञानिक रणनीतियाँ नहीं अपनाई गईं, तो भारत की कृषि, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता पर स्थायी संकट मंडरा सकता है।

