परिचय
सुधा मूर्ति: जब बात समाजसेवा, सादगी, और स्त्री-सशक्तिकरण की आती है, तो भारत में सुधा मूर्ति का नाम श्रद्धा और सम्मान से लिया जाता है। वे एक सफल लेखिका, शिक्षाविद्, और समाजसेविका होने के साथ-साथ इन्फोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन भी रही हैं। अपने शांत और सरल व्यक्तित्व के बावजूद उन्होंने समाज के सबसे वंचित वर्गों के लिए जो कार्य किए हैं, वे न केवल प्रेरणादायक हैं बल्कि लाखों लोगों की ज़िंदगी बदलने वाले भी हैं।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
सुधा मूर्ति का जन्म 19 अगस्त 1950 को कर्नाटक के शिगगांव नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता डॉ. आर. एच. कुलकर्णी एक प्रसिद्ध डॉक्टर थे और माता विमला कुलकर्णी शिक्षिका थीं। घर में शिक्षा और सेवा दोनों का वातावरण था, जिसने सुधा को बचपन से ही संस्कारित किया।
उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन किया और वह भारत की पहली महिला इंजीनियर बनीं जिन्होंने TATA मोटर्स में काम किया — उस दौर में जब महिलाओं के लिए तकनीकी क्षेत्र लगभग बंद था।
बाद में उन्होंने IISc, बेंगलुरु से मास्टर डिग्री (ME) भी हासिल की और उसमें गोल्ड मेडल प्राप्त किया।
करियर की शुरुआत: एक महिला की संघर्षगाथा
सुधा मूर्ति ने जब TATA मोटर्स (तब टेल्को) में नौकरी के लिए आवेदन किया, तब वहां महिलाओं को नौकरी नहीं दी जाती थी। उन्होंने जे.आर.डी. टाटा को पत्र लिखा, और उस पत्र का इतना गहरा असर हुआ कि उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाया गया और वे टाटा मोटर्स की पहली महिला इंजीनियर बनीं।
यह सिर्फ नौकरी नहीं थी, बल्कि उस सोच को तोड़ने की शुरुआत थी जो तकनीकी क्षेत्रों को केवल पुरुषों के लिए मानती थी।
नारायण मूर्ति से विवाह और परिवार
उनकी मुलाकात नारायण मूर्ति (इन्फोसिस के सह-संस्थापक) से हुई और बाद में दोनों ने विवाह कर लिया। सुधा मूर्ति ने अपने पति को इन्फोसिस की शुरुआत के लिए शुरुआती निवेश दिया था – ₹10,000 की राशि, जिससे आज करोड़ों लोगों का भविष्य जुड़ा है।
लेकिन उन्होंने करियर से ज़्यादा अपने परिवार और समाज सेवा को प्राथमिकता दी। ब्रिटेन के पिछले प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की सास भी हैं, लेकिन वे आज भी वैसी ही सादगी से रहती हैं जैसे पहले।
इन्फोसिस फाउंडेशन: सेवा का नया अध्याय
1996 में सुधा मूर्ति ने इन्फोसिस फाउंडेशन की स्थापना की और इसके माध्यम से उन्होंने देशभर में शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में काम किया।
मुख्य पहलें:
हज़ारों स्कूलों का निर्माण और पुनर्निर्माण
गाँवों में लाइब्रेरी और कंप्यूटर लैब स्थापित करना
ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल, टॉयलेट और पेयजल सुविधा
अनाथालय, महिला आश्रयगृह और वृद्धाश्रम का निर्माण
1 लाख+ से अधिक पुस्तकें मुफ्त में बाँटना
उनकी सेवा का दायरा केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश में फैला हुआ है।
एक संवेदनशील लेखिका की दुनिया
सुधा मूर्ति का लेखन सादगी, संवेदना और व्यवहारिक अनुभवों से भरा हुआ है। उन्होंने 20 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं — अंग्रेज़ी, कन्नड़, मराठी और हिंदी में। उनकी कहानियाँ जीवन के मूल्यों, रिश्तों और सामाजिक सरोकारों पर केंद्रित होती हैं।
प्रमुख पुस्तकें:
Wise and Otherwise
The Day I Stopped Drinking Milk
Dollar Bahu (इस पर टीवी सीरियल भी बना था)
House of Cards
Three Thousand Stitches
उनका लेखन जटिलता से नहीं, बल्कि सरलता में गहराई के लिए जाना जाता है। वे बच्चों के लिए भी प्रेरणादायक कहानियाँ लिखती हैं।
पुरस्कार और सम्मान
सुधा मूर्ति को उनके सामाजिक योगदान और लेखन के लिए अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया है:
पद्मश्री (2006) – भारत सरकार द्वारा
राज्योत्सव पुरस्कार – कर्नाटक सरकार
लोकमान्य तिलक पुरस्कार
राष्ट्रीय बाल साहित्य पुरस्कार
और कई विश्वविद्यालयों से मानद उपाधियाँ
साधारण जीवन, असाधारण सोच
सुधा मूर्ति का जीवन एकदम सादा है। वे आम लोगों की तरह यात्रा करती हैं, होटल से ज़्यादा धर्मशालाओं में रुकना पसंद करती हैं और आज भी सामान्य साड़ियों में देखी जाती हैं। उन्हें महंगी चीज़ें पहनने या दिखावे में विश्वास नहीं है।
उनकी यह सादगी ही उन्हें विशेष बनाती है।
बेटियों और महिलाओं के लिए प्रेरणा
वे हमेशा बेटियों को आत्मनिर्भर बनने की सलाह देती हैं। उनका मानना है:
“पढ़ाई एकमात्र वह पूंजी है, जिसे कोई आपसे छीन नहीं सकता।”
वे लड़कियों को तकनीकी, विज्ञान और समाजसेवा जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं।
नवाचार में विश्वास
सुधा मूर्ति एक ओर परंपरा से जुड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर तकनीक, आधुनिक शिक्षा और डिजिटल युग को भी महत्व देती हैं। उन्होंने ग्रामीण बच्चों के लिए कंप्यूटर और विज्ञान शिक्षा के लिए कई नवाचार किए हैं।
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निष्कर्ष
सुधा मूर्ति का जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर इरादे नेक हों और दृष्टि स्पष्ट हो, तो सीमित संसाधनों में भी बड़ी सामाजिक क्रांति लाई जा सकती है। वे आज भी हजारों-लाखों लोगों के लिए आशा और प्रेरणा की प्रतीक हैं। उनका जीवन एक ऐसी कहानी है, जिसे हर भारतीय जानना और आत्मसात करना चाहिए।

