🔷 भूमिका:
रूस-यूक्रेन के बीच 2022 में शुरू हुआ युद्ध अब तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका है। जहां प्रारंभिक वर्ष में संघर्ष का प्रभाव ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित रहा, वहीं अब इसका असर वैश्विक खाद्य सुरक्षा, उर्वरक आपूर्ति, और कृषि बाजारों पर गंभीर रूप से दिखने लगा है।
भारत, जो एक प्रमुख कृषि उत्पादक और उपभोक्ता देश है, इस संकट से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहा है और साथ ही उसे अपनी कूटनीति, व्यापार रणनीति और घरेलू नीतियों को भी अनुकूल बनाना पड़ रहा है।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
🌾 वैश्विक खाद्य संकट की पृष्ठभूमि:
रूस और यूक्रेन मिलकर दुनिया के लगभग 30% गेहूं और मक्का का निर्यात करते हैं।
युद्ध के कारण काला सागर बंदरगाहों से अनाज की आपूर्ति बाधित हुई है।
ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव का बार-बार टूटना वैश्विक खाद्य आपूर्ति को अस्थिर करता रहा है।
इससे अफ्रीका, मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में खाद्यान्न की भारी किल्लत पैदा हुई है।
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🔍 भारत पर प्रभाव: विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
1. घरेलू खाद्य मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी
खाद्यान्न की वैश्विक कीमतें बढ़ने से भारत में गेहूं, चावल, दालों और खाद्य तेलों की कीमतों पर दबाव आया।
सरकार को घरेलू मूल्य नियंत्रण हेतु स्टॉक लिमिट, निर्यात प्रतिबंध, और सब्सिडी योजनाओं को पुनः सक्रिय करना पड़ा।
2. निर्यात नीति में अस्थिरता
भारत ने 2022 और 2023 में गेहूं और चावल के निर्यात पर आंशिक प्रतिबंध लगाए, ताकि घरेलू बाजार में स्थिरता बनी रहे।
इससे एक ओर भारत को वैश्विक खाद्यान्न बाजार में स्थायी आपूर्तिकर्ता बनने का अवसर मिला, लेकिन बार-बार की पॉलिसी शिफ्ट से निर्यातक देशों का भरोसा भी डगमगाया।
3. उर्वरक आपूर्ति संकट और रूस पर निर्भरता
रूस और बेलारूस से पोटाश और यूरिया जैसे उर्वरक भारत में भारी मात्रा में आते हैं।
युद्ध और प्रतिबंधों के कारण आपूर्ति बाधित हुई और कीमतें बढ़ीं।
भारत को दीर्घकालीन आपूर्ति समझौते और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की ओर जाना पड़ा।
4. कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा
भारत ने युद्ध पर तटस्थ रुख अपनाया, लेकिन दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखा।
रूस से व्यापार और ऊर्जा सहयोग जारी रखते हुए भारत ने संयुक्त राष्ट्र में मानवीय सहायता के पक्ष में मतदान किया, जिससे उसकी तटस्थ लेकिन नैतिक छवि बनी रही।
5. भविष्य की रणनीति
भारत को अब वैश्विक खाद्य मूल्य शृंखला में स्थायित्व लाने के लिए प्रमुख भूमिका निभानी होगी।
ग्लोबल साउथ के साथ खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा पर सहयोग बढ़ाना भारत के लिए एक रणनीतिक अवसर बन सकता है।
🧭 निष्कर्ष:
रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक खाद्य आपूर्ति प्रणाली को बुरी तरह प्रभावित किया है। भारत, एक कृषि महाशक्ति होने के नाते, इस संकट को एक आर्थिक चुनौती के रूप में भी देखता है और एक राजनयिक अवसर के रूप में भी। जहां खाद्य मुद्रास्फीति और उर्वरक संकट को हल करने के लिए त्वरित घरेलू नीति की आवश्यकता है, वहीं अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की विश्वसनीयता और स्थायित्व भविष्य के सहयोग की नींव बन सकती है।

