बैंकिंग क्रेडिट ग्रोथ और जमा संकट भारत की वित्तीय प्रणाली के सामने नई चुनौती बनकर उभरे हैं। इस लेख में समझें कैसे बैंकों की लोन ग्रोथ बढ़ी है लेकिन डिपॉजिट्स पिछड़ रही हैं।
✍ लेखक: रूपेश कुमार सिंह
2025 में भारत के बैंकिंग क्षेत्र के सामने एक असामान्य असंतुलन खड़ा हो गया है — बैंकिंग क्रेडिट ग्रोथ और जमा संकट का दोहरा दबाव। एक ओर, बैंकों द्वारा दिए जा रहे कर्ज़ की रफ्तार ऐतिहासिक ऊंचाई पर है, वहीं दूसरी ओर, बैंकों में जमा (डिपॉजिट) की वृद्धि दर में गंभीर गिरावट देखी जा रही है। यह संकट देश की वित्तीय स्थिरता के लिए एक गहरी चेतावनी है।
क्रेडिट ग्रोथ: बैंकों की आक्रामक नीति
वित्त वर्ष 2024-25 की पहली तिमाही में भारतीय बैंकों ने 14.9% की दर से कर्ज़ दिया — यह पिछले पांच वर्षों में सबसे तेज ग्रोथ में से एक है। इसका मुख्य कारण था रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर, MSMEs और उपभोक्ता ऋण में तेज़ वृद्धि।
इससे बैंकों के लाभ में तो इज़ाफा हुआ, लेकिन क्रेडिट के मुकाबले डिपॉजिट्स की उपलब्धता कम होने लगी। यही वजह है कि बैंकिंग क्रेडिट ग्रोथ और जमा संकट आज सुर्खियों में है।
जमा संकट: जनता क्यों नहीं बढ़ा रही बचत?
जहां कर्ज़ लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, वहीं आम जनता की बचत दर घटती जा रही है। बढ़ती महंगाई, अस्थिर नौकरी सुरक्षा और निवेश के नए विकल्प (जैसे म्यूचुअल फंड, सोना, और क्रिप्टोकरेंसी) ने बैंकों में पारंपरिक बचत को हतोत्साहित किया है।
आरबीआई के अनुसार जून 2025 तक डिपॉजिट ग्रोथ घटकर 7.3% पर आ गई, जबकि यह आंकड़ा 2020 में 9.9% था। इस गिरावट का सबसे बड़ा असर बैंकिंग क्रेडिट ग्रोथ और जमा संकट के रूप में देखने को मिल रहा है।
बैंकों की प्रतिक्रिया: ब्याज दरों में वृद्धि
इस संकट से निपटने के लिए कई बैंकों ने फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर ब्याज दरें बढ़ा दी हैं।
उदाहरण के लिए:
SBI ने 2 साल की FD पर ब्याज 6.75% से बढ़ाकर 7.10% कर दिया।
HDFC और ICICI ने भी 0.20% से 0.30% की बढ़ोतरी की।
हालांकि, इन उपायों से आंशिक राहत तो मिली है, लेकिन समस्या की जड़ अभी बनी हुई है — बैंकिंग क्रेडिट ग्रोथ और जमा संकट एक दीर्घकालिक संरचनात्मक चुनौती है।
क्यों गंभीर है यह असंतुलन?
1. नकदी संकट की आशंका
अगर क्रेडिट डिमांड लगातार बढ़ती रही और जमा दरें नहीं सुधरीं, तो बैंकों को नकदी जुटाने के लिए पूंजी बाजार या RBI की मदद लेनी पड़ेगी। इससे लिक्विडिटी का असंतुलन और बढ़ेगा।
2. ब्याज दरों का दबाव
डिपॉजिट की सीमित उपलब्धता का अर्थ है कि बैंक लोन पर ज्यादा ब्याज लेने लगेंगे, जिससे उपभोक्ताओं और MSMEs पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा।
3. आरबीआई की दखल
आरबीआई को यह सुनिश्चित करना होगा कि बैंकिंग क्रेडिट ग्रोथ और जमा संकट प्रणालीगत जोखिम न बन जाए। इसके लिए कैश रिजर्व रेशियो (CRR) और स्टैच्युटरी लिक्विडिटी रेशियो (SLR) की सीमा में परिवर्तन किया जा सकता है।
क्या यह संकट अस्थायी है?
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संकट अस्थायी है और फेस्टिव सीजन के करीब आते-आते जमा दरों में सुधार देखने को मिलेगा। परंतु कई अर्थशास्त्री इससे असहमत हैं। उनका मानना है कि यह बैंकिंग क्रेडिट ग्रोथ और जमा संकट भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरी को दर्शाता है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
दुनिया भर में कई देशों ने इसी समस्या का सामना किया है। अमेरिका में 2022-23 में क्रेडिट तेजी से बढ़ा लेकिन जमा दरें ठहर गईं। वहां फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को आक्रामक तरीके से बढ़ाकर संतुलन बनाने की कोशिश की।
भारत के संदर्भ में यह रणनीति कारगर हो सकती है, लेकिन इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी गंभीर हो सकते हैं — खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के लिए।
समाधान की राह
बैंकिंग क्रेडिट ग्रोथ और जमा संकट से निपटने के लिए सरकार और आरबीआई को मिलकर काम करना होगा। कुछ संभावित उपाय:
जनता को बैंक डिपॉजिट के फायदे और सुरक्षा के बारे में जागरूक करना
डिजिटल फिक्स्ड डिपॉजिट स्कीम्स को बढ़ावा देना
टैक्स छूट जैसे प्रोत्साहन देना
ब्याज दरों को बाजार के हिसाब से और अधिक प्रतिस्पर्धात्मक बनाना
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निष्कर्ष
बैंकिंग क्रेडिट ग्रोथ और जमा संकट एक ऐसा आर्थिक तनाव है जिसे केवल ब्याज दर बढ़ाकर नहीं सुलझाया जा सकता। इसके लिए सरकार, आरबीआई, बैंकिंग सेक्टर और आम जनता — सभी की साझेदारी आवश्यक है। अगर इस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यह भारत की आर्थिक विकास गाथा में एक अवरोधक बन सकता है।

