महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ा शैक्षणिक निर्णय लेते हुए कक्षा 1 से 5 तक हिंदी भाषा को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य कर दिया है। इस फैसले का असर राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों पर पड़ेगा, जिसमें ICSE और CBSE बोर्ड भी शामिल हैं।
📌 सरकारी आदेश का विवरण:
राज्य शिक्षा मंत्रालय ने आदेश जारी करते हुए कहा कि:
“राज्य में भाषा समरसता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने हेतु यह कदम उठाया गया है। बच्चों को प्रारंभिक स्तर पर त्रिभाषा कौशल मिल सके, इसके लिए हिंदी को अनिवार्य किया गया है।”
यह आदेश अगले शैक्षणिक सत्र (2025–26) से लागू होगा।
😡 मराठी संगठनों का विरोध
इस निर्णय के तुरंत बाद, मराठी भाषा समर्थक संगठनों और कुछ राजनीतिक दलों ने सरकार के इस फैसले की आलोचना शुरू कर दी।
मराठी बाणा प्रतिष्ठान के अध्यक्ष शरद देशमुख ने कहा:
“यह मराठी भाषा के अस्तित्व पर कुठाराघात है। पहले से ही मराठी माध्यम का ह्रास हो रहा है, अब हिंदी को थोपने से हमारी भाषा और पिछड़ जाएगी।”
राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने भी इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।
🏫 विद्यालयों और शिक्षकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
कुछ स्कूलों ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह छात्रों को तीन भाषाओं में दक्षता देने में मदद करेगा।
वहीं, शिक्षकों का एक वर्ग मानता है कि यह निर्णय बोझ बढ़ा सकता है, खासकर उन छात्रों के लिए जिनकी पहली भाषा मराठी नहीं है।
⚖️ राजनीतिक पक्ष
शिवसेना (शिंदे गुट) और भाजपा ने इस निर्णय का समर्थन किया है, इसे “राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाला कदम” बताया है।
वहीं, कांग्रेस और NCP (शरद पवार गुट) ने इस पर स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या यह निर्णय मराठी भाषा को कमजोर करेगा।
📊 जनता की राय
सोशल मीडिया पर #मराठीमाझीओळख और #HindiNotCompulsory जैसे ट्रेंड चलने लगे हैं। आम नागरिकों की राय भी बंटी हुई है:
कुछ का मानना है कि हिंदी सीखना उपयोगी है, खासकर राष्ट्रीय स्तर पर करियर बनाने के लिए।
जबकि अन्य इसे “भाषिक दखलअंदाजी” के रूप में देख रहे हैं।
📚 पृष्ठभूमि
महाराष्ट्र में अब तक त्रिभाषा नीति वैकल्पिक थी, जिसमें मराठी, अंग्रेज़ी, और हिंदी में से स्कूल अपने अनुसार चयन करते थे। अब हिंदी को अनिवार्य करने से संवेदनशील भाषा समीकरण में हलचल आ गई है।
🔍 अंतिम निष्कर्ष
इस फैसले से राज्य की भाषायी और शैक्षणिक नीतियों में एक नया अध्याय शुरू हुआ है। लेकिन यह देखना अहम होगा कि सरकार विरोध को कैसे संभालती है, और छात्रों को नई नीति के अनुसार कैसे समायोजित किया जाएगा।

