Thursday, March 12, 2026
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SCO शिखर सम्मेलन में मोदी की भागीदारी: व्यापार युद्ध और आतंकवाद के साये में भारत की कूटनीति

SCO शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा, भारत की वैश्विक रणनीति और आतंकवाद के खिलाफ मजबूत संदेश का संकेत देती है। यह दौरा भारत-चीन और भारत-अमेरिका संबंधों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती के बीच हो रहा है।

✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 6 अगस्त 2025 को SCO (शंघाई सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलन में भागीदारी को केवल एक औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं माना जा सकता। यह यात्रा वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों, भारत-चीन तनाव, और आतंकवाद के मुद्दे के बीच हो रही है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण है कि मोदी की इस उपस्थिति का SCO की भू-राजनीति और भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर क्या प्रभाव पड़ेगा।


🛰️ SCO शिखर सम्मेलन का महत्व और भारत की भूमिका

SCO शिखर सम्मेलन एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय संगठन है, जिसमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान सहित मध्य एशियाई देशों की भागीदारी है। इसकी स्थापना का उद्देश्य सुरक्षा सहयोग, आतंकवाद विरोधी प्रयास, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देना था।

भारत वर्ष 2017 में पूर्ण सदस्य बना और तब से SCO के मंच का उपयोग आतंकवाद विरोधी रणनीति, ऊर्जा सुरक्षा, और क्षेत्रीय संतुलन के लिए करता आ रहा है।

  • 2025 का SCO सम्मेलन तिआनजिन, चीन में हो रहा है।

  • यह पीएम मोदी की पहली चीन यात्रा है, 2020 के गलवान संघर्ष के बाद।

  • सम्मेलन की थीम इस बार: “साझा सुरक्षा, साझा समृद्धि”


🔥 भारत-चीन संबंधों में नया अध्याय?

2017 में डोकलाम और 2020 में गलवान घाटी में हुए सैन्य टकरावों के बाद भारत और चीन के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने रहे हैं। SCO शिखर सम्मेलन जैसे मंच पर मोदी की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि भारत संवाद के लिए दरवाजे बंद नहीं कर रहा।

हालांकि, यह यात्रा भारत की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक परिपक्वता का प्रतीक है:

  • चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीतियों के विरुद्ध भारत का कड़ा रुख जारी है।

  • प्रधानमंत्री की इस यात्रा से दोनों देशों के बीच कम्युनिकेशन चैनल को फिर से सक्रिय किया जा सकता है।

  • भारत ने स्पष्ट किया है कि वह सीमा सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं करेगा, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए संवाद आवश्यक है।


⚔️ SCO शिखर सम्मेलन और आतंकवाद पर भारत का कड़ा संदेश

भारत हमेशा से SCO मंच पर आतंकवाद, कट्टरपंथ और सीमा-पार आतंकवाद के मुद्दे को उठाता रहा है, खासकर पाकिस्तान के संदर्भ में।

  • 2025 के सम्मेलन में भी पीएम मोदी ने बिना नाम लिए पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर कड़ा बयान देने की योजना बनाई है।

  • भारत चाहता है कि SCO एक ऐसा मंच बने, जहां आतंकवाद को सभी सदस्य देश बिना शर्त खारिज करें।

  • यह भारत की कूटनीतिक दृढ़ता को दर्शाता है, जिसमें वह बहुपक्षीय मंचों पर भी अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करता है।


⚖️ SCO में भारत की संतुलनकारी रणनीति

आज की भू-राजनीति में भारत एक संतुलक शक्ति बनकर उभर रहा है। SCO में उसकी रणनीति भी यही दिखती है:

  • SCO में चीन और रूस जैसे शक्तिशाली राष्ट्र हैं, जबकि भारत अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों के साथ भी मजबूत संबंध बना रहा है।

  • इस मंच पर भारत की भागीदारी यह संदेश देती है कि वह किसी गुट का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वतंत्र निर्णयकर्ता है।

  • SCO के जरिए भारत मध्य एशिया तक अपनी राजनीतिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक पहुंच को मजबूत कर रहा है।


🔍 व्यापार युद्ध और वैश्विक दबाव

2025 में भारत पर अमेरिका ने रूस से तेल आयात को लेकर 50% तक का टैरिफ लगा दिया है। ऐसे में भारत के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि वह रूस और चीन के साथ अपने रणनीतिक हितों को मजबूत करे।

  • SCO शिखर सम्मेलन में रूस के साथ द्विपक्षीय बैठकें भारत को ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और ब्रिक्स विस्तार में मदद कर सकती हैं।

  • अमेरिका के दबाव के बीच भारत को अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने की आवश्यकता है — और यह यात्रा उसी रणनीति का हिस्सा है।


🌏 भारत की वैश्विक छवि और मोदी का नेतृत्व

मोदी की SCO शिखर सम्मेलन में भागीदारी एक वैश्विक नेता के रूप में उनकी छवि को और मजबूत करती है।

  • वे केवल भारतीय हितों के रक्षक नहीं, बल्कि Global South की आवाज़ भी बन चुके हैं।

  • SCO शिखर सम्मेलन में उनकी भागीदारी से भारत को बहुपक्षीय मंचों पर नेतृत्व करने का अवसर मिलता है।

  • यह संदेश स्पष्ट है: भारत अब नीतियों का अनुसरण नहीं करता, बल्कि नीतियों का निर्माण करता है।


यह भी पढ़े: NSA अजीत डोभाल की रूस यात्रा: भारत-रूस और भारत-अमेरिका संबंधों में संतुलन की रणनीति

🔚 निष्कर्ष

SCO शिखर सम्मेलन 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति एक उच्च स्तरीय रणनीतिक दांव है। यह दौरा आतंकवाद के खिलाफ भारत के कड़े रुख, चीन के साथ सतर्क संवाद, और अमेरिका के व्यापारिक दबावों के बीच भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है।

जहाँ विश्व दो ध्रुवों की ओर बढ़ रहा है — भारत अपना अलग रास्ता बना रहा है: “संवाद के साथ स्वाभिमान”।

इस मंच से भारत एक बार फिर दिखा रहा है कि वह विश्व राजनीति में संतुलनकारी शक्ति नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति बन चुका है।

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