प्रस्तावना:
2025 में IMF की रिपोर्ट: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की जुलाई 2025 की ताज़ा रिपोर्ट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी की घंटी बनकर आई है। IMF ने वैश्विक विकास दर के अनुमान को एक बार फिर घटाते हुए वर्ष 2025 के लिए 2.8% तक सीमित कर दिया है। इस अनुमान में सबसे प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं—अमेरिका और चीन के बीच व्यापार तनाव, यूरोप और एशिया में धीमी औद्योगिक वृद्धि, और लगातार ऊंची बनी ब्याज दरें। इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि यह असंतुलन क्यों बढ़ रहा है, इसके पीछे के कारण क्या हैं, और भारत समेत दुनिया के लिए इसका क्या मतलब है।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
IMF की रिपोर्ट क्या कहती है?
18 जुलाई 2025 को IMF की रिपोर्ट अपनी अद्यतन वैश्विक आर्थिक दृष्टिकोण रिपोर्ट (World Economic Outlook Update) प्रकाशित की। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, IMF की रिपोर्ट ने पहले अनुमानित 3.1% विकास दर को अब घटाकर 2.8% कर दिया है। इसके लिए जो मुख्य कारण बताए गए हैं वे हैं:
- अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती व्यापार दरें (tariffs)
- यूरोप में ऊर्जा की ऊँची कीमतें और उपभोक्ता मांग में गिरावट
- कर्ज की ऊँची लागत और ब्याज दरों में वृद्धि
- विश्व स्तर पर निजी निवेश में गिरावट
वैश्विक व्यापार और विकास के बीच क्यों बढ़ रहा है फासला?
- व्यापार तनाव और संरक्षणवाद का पुनरुत्थान: अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा चीन और भारत जैसे देशों के आयात पर फिर से शुल्क बढ़ाने की नीति अपनाई गई है। इसके जवाब में चीन ने भी निर्यात सीमाओं पर सख्ती की है। इससे वैश्विक व्यापार का प्रवाह बाधित हुआ है और निवेशकों का भरोसा डगमगाया है।
- आपूर्ति श्रृंखला का पुनर्गठन: COVID-19 के बाद दुनिया भर में कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही हैं। इससे उत्पादन स्थानांतरण की प्रक्रिया तो तेज़ हुई है, लेकिन लागत में बढ़ोतरी और कुशल श्रमिकों की कमी के कारण उत्पादन में रुकावटें आ रही हैं।
- ब्याज दरों का दबाव: अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के केंद्रीय बैंकों ने मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें ऊँची रखी हैं। इससे कर्ज की लागत बढ़ गई है, जिससे छोटे और मध्यम व्यवसायों में निवेश की रफ्तार धीमी हो गई है।
- कृषि और खाद्य संकट: रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण खाद्य आपूर्ति पर असर पड़ा है। भारत, इंडोनेशिया और ब्राज़ील जैसे कृषि आधारित देशों में मौसम की अनिश्चितता के कारण खाद्य कीमतें बढ़ रही हैं।
IMF की चेतावनी: क्या हो सकता है आगे?
IMF की रिपोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यदि व्यापार तनाव जल्द नहीं सुलझा, तो वर्ष 2025 के उत्तरार्ध में वैश्विक मंदी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। IMF के अनुसार:
“Trade fragmentation is now the single biggest downside risk to the global economy in 2025.”
IMF की मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने कहा कि नीति निर्माताओं को व्यापार संवाद को पुनः स्थापित करना होगा और वैश्विक सहयोग को प्राथमिकता देनी होगी।
भारत पर असर: अवसर और चुनौतियां दोनों
भारत के लिए यह स्थिति मिश्रित परिणाम ला सकती है:
अवसर:
- पश्चिमी कंपनियों की ‘चीन प्लस वन’ नीति से भारत में निवेश का प्रवाह बढ़ सकता है।
- भारत की सेवा क्षेत्र (IT, BPO) की वैश्विक मांग बनी हुई है।
- स्टार्टअप्स और मैन्युफैक्चरिंग में PLI योजना का लाभ मिल सकता है।
चुनौतियां:
- निर्यात पर नकारात्मक असर, खासकर यूरोप और अमेरिका में मांग घटने से।
- कच्चे माल की कीमतों में अस्थिरता।
- भारत में भी ऊँची ब्याज दरों का असर MSME सेक्टर पर दिख सकता है।
समाधान क्या हो सकता है?
- वैश्विक संवाद की पुनर्बहाली: अमेरिका, चीन और EU को WTO जैसे मंचों पर फिर से व्यापार नियमों पर सहमति बनानी होगी।
- विकासशील देशों के लिए क्रेडिट राहत: IMF की रिपोर्ट और विश्व बैंक को मिलकर कर्ज राहत और पुनर्गठन योजनाएं बनानी होंगी।
- हरित निवेश (Green Investment): क्लाइमेट रिस्क को देखते हुए सौर, पवन ऊर्जा और EV सेक्टर में निवेश को प्राथमिकता देनी होगी।
- डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: भारत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में डिजिटल सेवाओं का विस्तार वैश्विक विकास को स्थिरता दे सकता है।
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निष्कर्ष:
IMF की रिपोर्ट की जुलाई 2025 की रिपोर्ट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी है, पर साथ ही वह एक अवसर भी है कि नीति निर्माता समय रहते कदम उठाएं। व्यापार तनाव और विकास दर के बीच बढ़ता फासला केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक असंतुलन को भी जन्म दे सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह समय सतर्क रहने का है, ताकि वह वैश्विक नेतृत्व की ओर कदम बढ़ा सके।

