मुंबई में बढ़ती गगनचुंबी इमारतें बनाम घटती हरियाली: देश की आर्थिक राजधानी, एक ऐसा महानगर है जहां हर इंच ज़मीन की कीमत करोड़ों में है। यहां विकास की रफ्तार बेमिसाल है—नई मेट्रो लाइनें, सी-लिंक, बुलेट ट्रेन, और सबसे प्रमुख रूप से, आकाश को छूती गगनचुंबी इमारतें। लेकिन इसी विकास के बीच एक गंभीर प्रश्न उभर रहा है—क्या ये ऊँची इमारतें मुंबई की हरियाली और पर्यावरण संतुलन को निगल रही हैं?
BMC द्वारा लगातार दिए जा रहे निर्माण स्वीकृति, पेड़ों की कटाई, और घटती खुली जगहों ने यह बहस छेड़ दी है कि मुंबई में “शहरीकरण” की जीत “पर्यावरणीय स्थिरता” की हार बनती जा रही है।
✍🏻 रिपोर्ट: रुपेश कुमार सिंह
1. BMC की बिल्डिंग अप्रूवल नीति: गगनचुंबी विकास को मिल रही खुली छूट?
Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC) ने पिछले पांच वर्षों में हाई-राइज बिल्डिंग प्रोजेक्ट्स को तेजी से मंजूरी दी है। खासकर कोविड के बाद, जब रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश बढ़ा, तो गोरेगांव, मलाड, कांदिवली, पवई, अंधेरी और बांद्रा जैसे इलाकों में 50 मंजिल से ऊपर की इमारतें खड़ी होनी शुरू हो गईं।
2023-24 में BMC ने 1,200 से अधिक हाई-राइज प्रोजेक्ट्स को अनुमति दी, जिनमें से 40% केवल पश्चिमी उपनगरों में हैं।
FSI (Floor Space Index) की छूट बढ़ाकर 5 तक कर दी गई है, जिससे बिल्डर्स अब छोटी जगह में भी ऊँची इमारतें बना सकते हैं।
कई मामलों में निर्माण कार्य आरंभ होने से पहले ही पेड़ों की कटाई हो चुकी होती है, और परियोजनाओं को “ग्रीन क्लियरेंस” बिना पर्यावरणीय समीक्षा के दे दिया जाता है।
यह नीति शहर की प्रकृति पर भारी पड़ती दिख रही है।
2. घटती खुली जगहें: मुंबई में हरा रंग अब दुर्लभ क्यों होता जा रहा है?
मुंबई पहले ही भारत के सबसे घने बसे शहरों में से एक है। UN-Habitat की रिपोर्ट के अनुसार:
मुंबई में प्रति व्यक्ति खुली जगह सिर्फ 1.1 वर्ग मीटर है, जबकि WHO की सिफारिश है 9 वर्ग मीटर।
गोरेगांव, कांदिवली, मलाड, पवई, चेंबूर, वडाला जैसे इलाकों में जहां पहले गार्डन, खेल के मैदान और पेड़-पौधे आम थे, वहाँ अब कंक्रीट के जंगल खड़े हो चुके हैं।
एक उदाहरण: गोरेगांव पूर्व में आरे कॉलोनी के किनारे सैकड़ों पेड़ काटे गए हैं ताकि रेजिडेंशियल टॉवर बन सकें। अब वहाँ स्थानीय लोग सांस की तकलीफ, गर्मी और जलभराव जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
3. पेड़ों की कटाई, गर्मी और जल संकट: एक दूसरे से जुड़ी कड़ियाँ
मुंबई की जलवायु अब पहले जैसी नहीं रही। 2025 में शहर ने सबसे गर्म अप्रैल दर्ज किया, जिसमें अधिकतम तापमान 39.2°C पहुँचा। यह बदलाव महज़ मौसम की मर्ज़ी नहीं, बल्कि बदलते पर्यावरणीय ढांचे का नतीजा है।
Heat Island Effect: गगनचुंबी इमारतें गर्मी को अवशोषित करती हैं और आसपास के इलाकों का तापमान 2–3°C तक बढ़ा देती हैं।
वर्षा जल संचयन का अभाव: अधिकांश हाई-राइज़ प्रोजेक्ट्स में पानी की कुशल प्रबंधन प्रणाली नहीं है। इसके कारण जलस्तर गिरता है।
पेड़ों की कटाई से न केवल छाया घटती है, बल्कि हवा की गुणवत्ता भी खराब होती है।
आंध्र और पवई जैसे क्षेत्र पहले हरियाली से भरे थे, अब वहाँ गर्मी अधिक, पानी की किल्लत आम और हवा प्रदूषित रहती है।
4. क्या बिल्डर लॉबी पर्यावरण नीति पर भारी पड़ रही है?
मुंबई में बिल्डर लॉबी को अक्सर “अदृश्य सत्ता” कहा जाता है। कई NGO और पर्यावरण विशेषज्ञ यह सवाल उठा चुके हैं कि:
रियल एस्टेट कंपनियों को पर्यावरणीय छूट अत्यधिक आसान प्रक्रियाओं से मिल जाती है।
निर्माण क्षेत्र के भ्रष्टाचार में BMC अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठते रहे हैं।
“ग्रीन क्लीयरेंस” प्रक्रिया केवल कागजों तक सीमित रह गई है।
2018–2024 के बीच BMC को पेड़ कटाई के लिए 3,000 से अधिक प्रस्ताव मिले। इनमें से 92% को बिना विरोध के मंजूरी दी गई। यह दर्शाता है कि कैसे पर्यावरणीय संतुलन को नजरअंदाज किया जा रहा है।
5. ग्रीन मुंबई योजनाओं की हकीकत: क्या ये सिर्फ PR हैं?
सरकार और BMC “ग्रीन मुंबई” नाम से कई योजनाएं चलाने का दावा करते हैं:
वृक्षारोपण अभियान
Miyawaki Urban Forest (कृत्रिम जंगल)
टेरेस गार्डन प्रमोशन स्कीम
ग्रीन बिल्डिंग रेटिंग प्रणाली
लेकिन इन योजनाओं की जमीनी सच्चाई कमज़ोर है:
रोपे गए पौधों की देखभाल का कोई ट्रैक नहीं होता।
टेरेस गार्डन या हरित दीवारें केवल हाई-एंड सोसाइटी में ही सीमित हैं।
नागरिकों को शामिल करने के बजाय, इन योजनाओं को केवल फोटो ऑप तक सीमित रखा गया है।
उदाहरण: BMC का Miyawaki Forest प्रोजेक्ट घाटकोपर में 2023 में आरंभ हुआ था, लेकिन अब वह क्षेत्र फिर से निर्माण योजना के दायरे में है।
6. नागरिकों का रुख: विरोध, याचिकाएं और जन चेतना
हाल के वर्षों में आम नागरिकों ने हरियाली के लिए आवाज़ उठाई है:
आरे कॉलोनी में मेट्रो कारशेड के विरोध में हजारों लोग सड़कों पर उतरे।
कई सोसाइटीज़ अब “No Tree No Vote” जैसे अभियान चला रही हैं।
RTI और जनहित याचिकाओं के ज़रिए पर्यावरण विनाश पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि मुंबई का नागरिक वर्ग अब जागरूक है, लेकिन उनकी आवाज़ को निर्णय लेने वाले कितनी अहमियत देते हैं — यह सवाल खुला है।
7. समाधान की राह: विकास और हरियाली का संतुलन कैसे हो?
मुंबई को विकास की जरूरत है, लेकिन यह विकास “हरियाली की बलि पर” नहीं होना चाहिए। संभावित समाधान:
✅ 1. ट्रांसपेरेंट ग्रीन क्लीयरेंस सिस्टम
हर प्रोजेक्ट को सार्वजनिक रूप से ऑनलाइन उपलब्ध कराना, जिसमें पेड़ कटाई की योजना, पुनर्रोपण और पर्यावरण प्रभाव का विवरण हो।
✅ 2. “ट्री रेशियो” अनिवार्य करना
जितनी मंजिल की इमारत बने, उसके हिसाब से कम से कम उतने ही पेड़ लगाना अनिवार्य हो।
✅ 3. Urban Forest Act का निर्माण
हर वार्ड में कम से कम एक शहरी जंगल बनाने को कानूनन अनिवार्य किया जाए।
✅ 4. बिल्डिंग डिजाइन में ग्रीन एलीमेंट
ग्रीन रूफ, वर्टिकल गार्डन, वर्षा जल संचयन और सोलर एनर्जी सिस्टम को ज़रूरी बनाना।
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निष्कर्ष: क्या मुंबई का भविष्य केवल ऊँचाई में है?
मुंबई अगर सिर्फ ऊपर की ओर बढ़ेगी और जमीन की हरियाली को कुर्बान करती रही, तो वह न सिर्फ पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ेगी, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य, जल, और जीवन स्तर को भी नुकसान पहुँचाएगी।
आज ज़रूरत है संतुलित दृष्टिकोण की, जहां विकास और पर्यावरण हाथ में हाथ डालकर चलें, न कि एक-दूसरे के विरोधी बनें।

