नालंदा विश्वविद्यालय, जो आज बिहार राज्य में स्थित है, प्राचीन भारत के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षा केंद्रों में से एक था। इसे दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय भी माना जाता है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक यह विश्वविद्यालय बौद्ध, वैदिक, जैन और अन्य विषयों की उच्च शिक्षा का वैश्विक केंद्र बना रहा।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
नालंदा की स्थापना और विकास
नालंदा की स्थापना गुप्त सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने 5वीं शताब्दी में की थी। यह विश्वविद्यालय 10,000 से अधिक छात्रों और 2,000 से अधिक शिक्षकों का घर था। यहां भारत, तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, श्रीलंका जैसे देशों से विद्यार्थी पढ़ने आते थे। नालंदा केवल बौद्ध शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें दर्शनशास्त्र, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और व्याकरण जैसे विषय भी पढ़ाए जाते थे।
महान विद्वान और शिक्षक
नालंदा में शिक्षण देने वाले महान आचार्यों में नागार्जुन, आर्यदेव, धम्मपाल, शीलभद्र, और चंद्रपाल जैसे प्रसिद्ध नाम आते हैं। यहां पढ़ चुके सबसे प्रसिद्ध चीनी विद्वान ह्वेनसांग (Xuanzang) और इत्सिंग (Yijing) ने भी नालंदा का विस्तृत वर्णन किया है। ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा वृतांत में लिखा है कि नालंदा में प्रवेश परीक्षा पास करना अत्यंत कठिन था और विद्यार्थी कठिन तपस्या के साथ अध्ययन करते थे।
स्थापत्य और संरचना
नालंदा का परिसर अत्यंत भव्य और सुव्यवस्थित था। इसमें नौ विशाल मंदिर, कई प्रार्थना भवन, व्याख्यान हॉल, पुस्तकालय भवन (धर्मगुंज), और स्नातक छात्रावास थे। धर्मगुंज पुस्तकालय तीन भागों में विभाजित था और इसमें लाखों पांडुलिपियाँ संरक्षित थीं। इसका संग्रह इतना विशाल था कि इसे जलाने में मुस्लिम आक्रांताओं को तीन महीने तक आग जलाए रखनी पड़ी।
यह भी पढ़े: भारत-पाकिस्तान विभाजन 1947 की असली कहानी: कारण, दर्द और प्रभाव
विध्वंस और पतन
1193 ईस्वी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर हमला किया और उसे पूरी तरह नष्ट कर दिया। पुस्तकालय को जलाया गया, शिक्षक व छात्र मारे गए और भारत की बौद्धिक परंपरा को एक भारी आघात पहुँचा। इस आक्रमण को भारतीय इतिहास के सबसे बड़े सांस्कृतिक नुकसान के रूप में देखा जाता है।
आधुनिक पुनरुद्धार
21वीं सदी में भारत सरकार और बिहार सरकार ने मिलकर नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया। 2010 में एक नए नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई जो अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ उच्च शिक्षा और अनुसंधान का केंद्र बन रहा है।
वैश्विक महत्व
नालंदा न केवल प्राचीन भारत की शिक्षा परंपरा का गौरव है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण भी है कि भारत ने हजारों वर्षों पूर्व वैश्विक शिक्षा प्रणाली का निर्माण कर लिया था।

