Wednesday, February 11, 2026
No menu items!
HomeHistoryभारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी आंदोलनों की अनदेखी कहानी

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी आंदोलनों की अनदेखी कहानी

भारत का स्वतंत्रता संग्राम अक्सर 1857 की क्रांति से शुरू होकर गांधी, नेहरू, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं के योगदान तक सीमित कर दिया जाता है। लेकिन इसी इतिहास के पन्नों में कई ऐसे आदिवासी आंदोलन भी दबे हुए हैं जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत को सीधी चुनौती दी थी। यह आंदोलन न केवल स्वाभिमान की लड़ाई थे बल्कि साम्राज्यवादी, पूंजीवादी और सामाजिक शोषण के खिलाफ जनप्रतिरोध की मिसाल थे। दुर्भाग्यवश, भारत के मुख्यधारा इतिहास में इन संघर्षों को वह स्थान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे।

✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह


आदिवासी आंदोलनों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत के आदिवासी समाज प्रकृति आधारित जीवनशैली, सामूहिक संसाधनों और स्वतंत्र अस्तित्व में विश्वास करते थे। अंग्रेजों ने जब ज़मीन, जंगल और जल पर अधिकार जमाया, तब सबसे पहले इसी समुदाय ने विद्रोह किया। ज़मींदारी प्रथा, वन अधिनियम, भारी कर प्रणाली और धार्मिक हस्तक्षेपों ने इन समुदायों को उनके अस्तित्व के लिए लड़ने पर मजबूर कर दिया।


प्रमुख आदिवासी आंदोलन और उनका ऐतिहासिक महत्व

1. संथाल विद्रोह (1855-56)

स्थान: वर्तमान झारखंड, बंगाल का भाग
नेता: सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव
कारण: ज़मींदारों, साहूकारों और ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा शोषण।
महत्व: संथाल विद्रोह ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ सबसे बड़ा संगठित आदिवासी विद्रोह था। हजारों संथालों ने हथियार उठाए और कुछ समय के लिए अपनी स्वतंत्र सरकार भी स्थापित की।


2. भील आंदोलन (1818-1858)

स्थान: राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात
नेता: गोविंद गुरु, भिलाना के शासक
कारण: भूमि अधिग्रहण, वन संसाधनों पर रोक और कर प्रणाली
महत्व: भीलों का संघर्ष सदी भर चला और उन्होंने गुरिल्ला युद्ध तकनीक से ब्रिटिश सेनाओं को परेशान किया।


3. कोल विद्रोह (1831-32)

स्थान: छोटा नागपुर क्षेत्र
नेता: बुधु भगत
कारण: ज़मींदारों और अंग्रेजों द्वारा भूमि अधिग्रहण और कर वसूली
महत्व: यह विद्रोह स्थानीय राजाओं और आदिवासियों की सांझी लड़ाई थी, जिसने अंग्रेजी प्रशासन को अस्थायी रूप से हिलाकर रख दिया।


4. बिरसा मुंडा आंदोलन (1895-1900)

स्थान: छोटानागपुर (वर्तमान झारखंड)
नेता: बिरसा मुंडा
कारण: भूमि अधिकार, ईसाई मिशनरियों का धर्मांतरण, वन अधिनियम
महत्व: बिरसा मुंडा ने “उलगुलान” यानी महान विद्रोह का नेतृत्व किया। वे आदिवासी चेतना के प्रतीक बन गए और उनकी मृत्यु के बाद भी आंदोलन जीवित रहा।


ब्रिटिश प्रशासन की प्रतिक्रिया

इन आंदोलनों को अंग्रेजों ने कभी भी ‘राष्ट्रवादी आंदोलन’ नहीं माना। उन्होंने उन्हें “क्रिमिनल ट्राइब्स” कहा और सैन्य बल का प्रयोग कर कुचल दिया। दमन के बावजूद इन आंदोलनों ने आने वाले राष्ट्रीय आंदोलनों को प्रेरणा दी। कई बार, स्थानीय नेतृत्व और आदिवासी प्रतिरोध ने ब्रिटिश प्रशासन को वन और भूमि कानूनों में संशोधन करने को मजबूर किया।


इतिहास लेखन में उपेक्षा क्यों?

आदिवासी आंदोलनों को मुख्यधारा के स्वतंत्रता संग्राम से अलग इसलिए रखा गया क्योंकि:

  • उनका नेतृत्व गांधी-नेहरू जैसे शहरी, शिक्षित वर्ग से नहीं था

  • वे स्थानीय स्तर पर संगठित थे और राष्ट्रवाद की परिभाषा में फिट नहीं बैठते थे

  • ब्रिटिश दस्तावेज़ों और बाद के इतिहासकारों ने इन्हें ‘विद्रोह’ कहकर कमतर आँका

हालाँकि, इन आंदोलनों में आत्मसम्मान, आज़ादी और स्वराज की भावना कूट-कूट कर भरी थी।


समकालीन भारत में इन आंदोलनों का महत्व

आज जब आदिवासी समुदाय जल, जंगल और ज़मीन के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब इतिहास के ये आंदोलन उन्हें प्रेरणा देते हैं। बिरसा मुंडा जैसे नायकों की मूर्तियाँ, झारखंड का राज्य दिवस और जनजातीय गौरव दिवस, इस बात का प्रतीक हैं कि आदिवासी चेतना अब पुनः जागृत हो रही है।


यह भी पढ़े: 1857 की क्रांति: क्या यह भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था?

निष्कर्ष

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी आंदोलनों की भूमिका को भुला देना केवल ऐतिहासिक अन्याय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी हानिकारक है। यदि हमें एक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज बनाना है, तो हमें इन अनकही कहानियों को मुख्यधारा में लाना ही होगा। इन आंदोलनों ने भारत की आज़ादी की नींव में एक मौलिक ईंट जोड़ी थी—स्वाभिमान, स्वराज और सामूहिक प्रतिरोध की ईंट।

इन आंदोलनों की विरासत को पुनर्जीवित करना आज की सामाजिक न्याय की लड़ाई के लिए भी उतना ही ज़रूरी है जितना तब था।

News Next
News Nexthttp://news-next.in
News Next is a website that covers the latest news from around the world. It provides updates on current events, politics, business, entertainment, technology, and more. It was founded by independent journalist Rupesh Kumar Singh. Contact us: newsnextweb@gmail.com
RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments