लाहौर समझौता और कारगिल युद्ध के बीच की कूटनीतिक गतिविधियों का विश्लेषण करें। क्या यह भारत की ऐतिहासिक भूल थी या पाकिस्तान की रणनीतिक चाल? जानिए अटल-नवाज़ युग की सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
1999 का साल भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास में सबसे विरोधाभासी घटनाओं से भरा हुआ है। फरवरी में हुआ लाहौर समझौता, जहां अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ ने शांति की पहल की, और मई में शुरू हुआ कारगिल युद्ध — जिसने इस पहल को खून में डुबो दिया।
यह लेख इसी विरोधाभास की गहराई से जांच करता है: लाहौर समझौता क्या एक ऐतिहासिक भूल थी या पाकिस्तान की सोची-समझी रणनीतिक चाल?
लाहौर समझौता: एक उम्मीद की शुरुआत
20-21 फरवरी 1999 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ऐतिहासिक लाहौर यात्रा ने भारत-पाक संबंधों में एक नई शुरुआत का संकेत दिया। लाहौर समझौता के तहत दोनों देशों ने आपसी संवाद, परमाणु सुरक्षा और आपसी सम्मान की नीति पर सहमति जताई। यह पहली बार था जब दोनों परमाणु संपन्न राष्ट्रों ने इस स्तर पर कोई लिखित संकल्प लिया था।
कारगिल युद्ध: शांति की पीठ में छुरा
अभी इस समझौते की स्याही सूखी भी नहीं थी कि मई 1999 में कारगिल सेक्टर में पाकिस्तानी घुसपैठ शुरू हो गई। भारतीय सेना के अनुसार, यह सिर्फ सैनिक कार्रवाई नहीं बल्कि एक “नियोजित घुसपैठ” थी।
यह यहीं सवाल खड़ा करता है — क्या लाहौर समझौता केवल एक दिखावा था ताकि भारत को असावधान रखा जा सके?
नवाज शरीफ की भूमिका: धोखे के जानकार या सैन्य तंत्र के शिकार?
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर दो दृष्टिकोण हैं:
उन्होंने सेना के साथ मिलकर जानबूझकर भारत को गुमराह किया।
पाकिस्तानी सेना (विशेषतः जनरल परवेज मुशर्रफ) ने उन्हें विश्वास में नहीं लिया।
कई दस्तावेजों और अमेरिकी अधिकारियों के बयानों के अनुसार, नवाज शरीफ को कारगिल ऑपरेशन की पूरी जानकारी नहीं थी। लेकिन सवाल यह है कि यदि जानकारी नहीं थी, तो फिर पाकिस्तान की लोकतांत्रिक व्यवस्था कितनी खोखली थी?
भारत की रणनीतिक चूक
लाहौर समझौता करते समय भारत ने पाकिस्तान की सेना और खुफिया तंत्र (ISI) की भूमिका को कम करके आंका। भारत को यह समझना चाहिए था कि पाकिस्तान में सत्ता का असली केंद्र प्रधानमंत्री नहीं, सेना है।
इस चूक के कारण भारत की कूटनीति को करारा झटका लगा और देश को युद्ध की स्थिति का सामना करना पड़ा।
वाजपेयी की शांति नीति: साहस या सरलता?
वाजपेयी जी की पहल को आज भी कई लोग “राजनीतिक साहस” मानते हैं। लेकिन कुछ विश्लेषक इसे “राजनीतिक सरलता” भी कहते हैं।
उन्होंने अपनी लोकप्रियता और जनमत को खतरे में डालकर पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाया — पर बदले में भारत को कारगिल मिला।
जनरल मुशर्रफ की साजिश: सैन्य विस्तारवाद का नमूना
कारगिल युद्ध की योजना मुख्यतः पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने बनाई थी। उन्होंने पाकिस्तान की सीमाओं को बदलने की कोशिश की, ताकि सियाचिन और लेह क्षेत्र में भारत की स्थिति को कमजोर किया जा सके।
यह स्पष्ट करता है कि लाहौर समझौता पाकिस्तान की सत्ता का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहा था — बल्कि सिर्फ एक राजनीतिक मुखौटा था।
मीडिया और जनमत का प्रभाव
कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय मीडिया ने राष्ट्रवाद को उभारते हुए सरकार को मजबूती दी। लाहौर समझौता के बावजूद जनता का भरोसा पाकिस्तान से टूट चुका था। युद्ध के समय देशभर में यह भावना थी कि “अब बातचीत नहीं, जवाब देना होगा”।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: अमेरिका की भूमिका
अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने लाहौर समझौता की सराहना की थी, लेकिन कारगिल के दौरान पाकिस्तान की निंदा की। यह पहली बार था जब अमेरिका ने स्पष्ट रूप से पाकिस्तान को सीमा पार से अपनी सेना हटाने का दबाव डाला।
नवाज शरीफ को वॉशिंगटन बुलाकर तत्कालवापसी का अल्टीमेटम देना एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ था।
क्या भारत को सबक मिला?
कारगिल युद्ध के बाद भारत ने अपनी खुफिया प्रणाली को मजबूत किया, सीमा पर चौकसी बढ़ाई और सैन्य योजनाओं को आधुनिक रूप दिया।
लाहौर समझौता के अनुभव से यह भी सीखा गया कि पाकिस्तान के साथ किसी भी समझौते में उसकी सेना की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
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निष्कर्ष: ऐतिहासिक भूल या रणनीतिक सबक?
लाहौर समझौता अपने आप में न तो पूर्ण भूल था और न ही पूर्ण रणनीति। यह एक ईमानदार पहल थी, जिसे धोखे से रौंदा गया।
यह घटना हमें सिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में केवल भावनाएं नहीं, बल्कि यथार्थ का ठोस मूल्यांकन आवश्यक होता है।
भारत की शांति नीति और पाकिस्तान की सैन्य सोच के बीच यह टकराव आज भी दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को प्रभावित करता है।

