भूमिका:
यूक्रेन युद्ध का तीसरा वर्ष: 24 फरवरी 2022 को शुरू हुआ रूस-यूक्रेन युद्ध अब तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका है। जून 2025 तक यह संघर्ष न केवल समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि अब यह एक “जमे हुए युद्ध” (Frozen Conflict) के रूप में पहचाना जा रहा है – जिसमें युद्धविराम नहीं है, लेकिन निर्णायक जीत भी किसी को नहीं मिली।
इस लंबे युद्ध ने न केवल यूरोप की सामरिक और ऊर्जा सुरक्षा को झकझोरा है, बल्कि दुनिया भर में खाद्यान्न आपूर्ति, मुद्रास्फीति और राजनीतिक अस्थिरता को भी जन्म दिया है। यह लेख इसी जटिल परिस्थिति का विश्लेषण करता है।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
1. यूरोप की सुरक्षा रणनीति में परिवर्तन
❖ नाटो का विस्तार और सामूहिक रक्षा नीति
2023 में फिनलैंड और स्वीडन ने आधिकारिक रूप से नाटो में प्रवेश कर लिया था।
2024-25 में नाटो ने अपने पूर्वी सीमांत (Baltics, पोलैंड, रोमानिया) पर सैनिकों की स्थायी तैनाती को बढ़ाया।
अमेरिकी और ब्रिटिश रक्षा बजट में वृद्धि और यूरोपीय सेनाओं का आधुनिकीकरण तेजी से हुआ।
❖ रणनीतिक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता
जर्मनी, फ्रांस और इटली अब अमेरिकी रक्षा छत्र पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
EU Defense Initiative के तहत यूरोपीय हथियार निर्माण और साइबर डिफेंस में निवेश दोगुना हो गया है।
2025 में यूरोपीय संघ ने अपनी पहली “साझा रक्षा नीति” (European Security Framework) का मसौदा प्रस्तुत किया है।
निष्कर्ष:
यूक्रेन युद्ध ने यूरोप को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि भरोसेमंद रक्षा तंत्र और एकजुट रणनीति के बिना वह रूस जैसे शक्तिशाली पड़ोसी का सामना नहीं कर सकता।
2. वैश्विक खाद्य संकट और गेहूं आपूर्ति पर प्रभाव
❖ रूस-यूक्रेन का अनाज निर्यात में योगदान
यूक्रेन और रूस, दोनों मिलकर दुनिया के कुल गेहूं निर्यात का लगभग 28% हिस्सा रखते हैं।
2022 में युद्ध के शुरू होते ही ब्लैक सी पोर्ट्स (ओडेसा आदि) से निर्यात रुक गया था।
संयुक्त राष्ट्र की Black Sea Grain Initiative 2023 तक ही प्रभावी रही; 2024 में रूस ने इसे नवीनीकृत करने से मना कर दिया।
❖ 2024-25 में क्या हुआ?
यूक्रेन ने वैकल्पिक भूमि रूट (जैसे पोलैंड और स्लोवाकिया) से निर्यात की कोशिश की, लेकिन लागत बहुत अधिक रही।
रूस ने गेहूं का निर्यात मुख्य रूप से चीन, भारत और तुर्की को रियायती दरों पर किया, लेकिन यह “राजनीतिक समर्थन” से जुड़ा था।
❖ खाद्य असुरक्षा बढ़ी
अफ्रीका, विशेष रूप से पूर्वी अफ्रीका, सोमालिया, सूडान, और इथियोपिया, में खाद्य संकट गहरा गया।
भारत, जो खुद भी आयातक है, को घरेलू कीमतें नियंत्रित करने के लिए 2024 में गेहूं और चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा।
3. रूस-चीन-ईरान ब्लॉक: एक नया वैश्विक गठबंधन?
❖ रूस का एशियाई झुकाव
पश्चिमी प्रतिबंधों से घिरे रूस ने चीन, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी बढ़ाई।
चीन ने रूस से सस्ते तेल और गैस का भरपूर लाभ उठाया।
ईरान ने रूस को ड्रोन और मिसाइल सप्लाई करके अपना सैन्य सहयोग सिद्ध किया।
❖ ब्रिक्स विस्तार और ‘ग्लोबल साउथ’ की राजनीति
2024 में ब्रिक्स में ईरान, सऊदी अरब, यूएई, मिस्र जैसे देशों को शामिल कर लिया गया।
यह एक अमेरिका-विरोधी आर्थिक और राजनीतिक ब्लॉक बनता जा रहा है, जिसका असर G7 जैसी पश्चिमी संस्थाओं पर देखा जा रहा है।
निष्कर्ष:
रूस, चीन और ईरान की त्रिपक्षीय रणनीति ने वैश्विक शक्ति संतुलन को चुनौती दी है। यह न केवल वैश्विक व्यापार, बल्कि कूटनीति और ऊर्जा सुरक्षा को भी पुनर्परिभाषित कर रहा है।
4. युद्धविरोधी लहरें और वैश्विक कूटनीति की सीमाएँ
❖ यूरोप में थकान और असंतोष
2024 के अंत तक फ्रांस, जर्मनी, और हंगरी जैसे देशों में युद्धविरोधी प्रदर्शन तेज़ हो गए थे।
“Why are we funding a never-ending war?” जैसे सवाल आम होने लगे।
अमेरिका में 2024 के चुनाव के बाद नई सरकार ने यूक्रेन को सहायता पर शर्तें लगानी शुरू कर दी हैं।
❖ वैश्विक मध्यस्थता प्रयास
संयुक्त राष्ट्र, तुर्की, और भारत ने शांति वार्ता के कई प्रयास किए, लेकिन रूस की अपरिवर्तनीय मांगें (Donbas का पूर्ण नियंत्रण, NATO से यूक्रेन की दूरी) बाधक बनीं।
चीन ने 2024 में “12-पॉइंट पीस प्लान” पेश किया, लेकिन यूक्रेन ने इसे “Pro-Russia” कहकर नकार दिया।
❖ 2025 में क्या स्थिति है?
युद्ध सीमित क्षेत्रों में सिमट चुका है, लेकिन समाधान की कोई स्पष्ट योजना नहीं है।
विशेषज्ञ इसे “Low-intensity prolonged conflict” मान रहे हैं।
5. भारत की भूमिका: तटस्थता, व्यापार और कूटनीति
❖ भारत का संतुलन
भारत ने युद्ध की शुरुआत से ही तटस्थता बरती है – न तो रूस की खुलेआम आलोचना, न ही उसका समर्थन।
रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदने पर भारत को पश्चिमी देशों की आलोचना का सामना करना पड़ा, लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
❖ वैश्विक खाद्य संकट में भारत की भूमिका
2022-23 में भारत ने गेहूं, चावल और खाद्य तेलों के निर्यात में बढ़ोतरी की थी, लेकिन 2024 में घरेलू कीमतों के कारण ये निर्यात सीमित कर दिया गया।
भारत ने अफ्रीकी देशों को मानवीय सहायता प्रदान की, जिससे उसकी “Global South Leader” की छवि बनी रही।
❖ कूटनीतिक प्रयास
भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों के नेताओं के साथ लगातार संपर्क रखा है।
नई दिल्ली में आयोजित G20 समिट (2023) और SCO समिट (2024) में भारत ने “Dialogue, not war” नीति को प्राथमिकता दी।
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निष्कर्ष:
यूक्रेन युद्ध अब केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, खाद्य आपूर्ति, ऊर्जा नीति, और सुरक्षा ढाँचे के लिए एक निर्णायक मोड़ बन गया है। 2025 में यह युद्ध सभी शक्तियों के लिए एक कूटनीतिक परीक्षा बन चुका है – जहाँ सैन्य समाधान असंभव और राजनीतिक समाधान कठिन प्रतीत होता है।
भारत जैसे देशों के लिए यह समय है कि वह विकसित और विकासशील देशों के बीच पुल का कार्य करें, और वैश्विक शांति स्थापना की दिशा में नेतृत्व दिखाएँ।

