भारत में करियर गाइडेंस की विफलता: भारत जैसे युवा देश में, शिक्षा और रोजगार के बीच एक गहरी खाई बनती जा रही है। हर साल लाखों छात्र महंगे और प्रतिष्ठित कोर्स में दाखिला लेते हैं, लेकिन डिग्री के बाद भी नौकरी की तलाश में भटकते रहते हैं। इसका एक बड़ा कारण है – भारत में करियर गाइडेंस की विफलता। यह एक ऐसा संकट है जिसकी जड़ें हमारे शिक्षा प्रणाली, सामाजिक दबाव और सरकारी नीति की कमज़ोरियों में छिपी हैं।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
🎓 भारत में करियर गाइडेंस की विफलता, शिक्षा बनाम रोजगार: टूटता संतुलन
आज भारत में हर साल लगभग 1.5 करोड़ ग्रेजुएट शिक्षा प्रणाली से बाहर निकलते हैं, लेकिन उनमें से आधे से भी कम को नौकरी मिलती है जो उनके अध्ययन क्षेत्र से मेल खाती है। लाखों छात्र इंजीनियरिंग, बी.कॉम, एमबीए जैसे पारंपरिक कोर्स चुनते हैं — सिर्फ इसलिए क्योंकि वे लोकप्रिय हैं या “सेफ ऑप्शन” माने जाते हैं।
भारत में करियर गाइडेंस की विफलता का यही सबसे बड़ा दुष्परिणाम है: छात्र अपने वास्तविक रुचि, योग्यता और बाज़ार की मांग को समझे बिना गलत कोर्स चुनते हैं।
🧭 क्यों नहीं मिलता छात्रों को सही करियर मार्गदर्शन?
1. स्कूल स्तर पर काउंसलिंग की भारी कमी
भारत के सरकारी और अधिकतर निजी स्कूलों में करियर काउंसलिंग जैसी कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है। CBSE या राज्य बोर्ड ने इस दिशा में कुछ दिशा-निर्देश दिए हैं, लेकिन उसका ज़मीनी कार्यान्वयन शून्य के बराबर है।
2. माता-पिता और समाज का दबाव
आज भी ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अभिभावकों की सोच ये रहती है कि “इंजीनियर बनो या डॉक्टर”, बिना यह देखे कि छात्र की रुचि किसमें है। करियर गाइडेंस की जगह पारिवारिक दबाव और सामाजिक उम्मीदें निर्णय तय करती हैं।
3. कॉलेज स्तर पर केवल प्लेसमेंट की फिक्र, गाइडेंस नहीं
कॉलेजों में करियर गाइडेंस सेल सिर्फ नाम के लिए होते हैं। असल में वे प्लेसमेंट सेल में बदल चुके हैं जिनका ध्यान सिर्फ अंतिम वर्ष में कंपनियों को बुलाने पर होता है। करियर योजना का कोई दीर्घकालिक सोच वहां नहीं पनप पाती।
📉 परिणाम: बेरोजगारी, कुंठा और करियर शिफ्ट
भारत में करियर गाइडेंस की विफलता का परिणाम सिर्फ बेरोजगारी तक सीमित नहीं है। इसके दूरगामी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी हैं:
इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर BPO या सेल्स की नौकरी करना
MBA के बाद रीजनल बैंकिंग एजेंट बनना
डिप्लोमा के बाद वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते रहना
इन स्थितियों में युवा वर्ग में कुंठा, आत्मविश्वास में कमी और आर्थिक अस्थिरता देखने को मिलती है।
🔍 भारत में करियर गाइडेंस की विफलता, क्या कहती हैं रिपोर्टें?
हाल ही में India Skills Report 2024 के अनुसार, केवल 51% ग्रेजुएट ही नौकरी के लायक स्किल्स रखते हैं। इसका मुख्य कारण यह बताया गया कि छात्रों ने वह कोर्स चुना जो रोज़गार बाज़ार की ज़रूरतों से मेल नहीं खाता।
🧩 भारत में करियर गाइडेंस की विफलता, समाधान क्या हो सकते हैं?
1. स्कूल स्तर पर साइकोमैट्रिक टेस्ट और करियर फेयर
10वीं और 12वीं के छात्रों के लिए करियर एप्टीट्यूड टेस्ट और गाइडेंस कार्यक्रम अनिवार्य होने चाहिए। इससे छात्र अपने रूझान और क्षमताओं को समय रहते पहचान सकेंगे।
2. कॉलेज में प्रोफेशनल करियर काउंसलर की नियुक्ति
हर कॉलेज में योग्य करियर काउंसलर होना चाहिए जो छात्रों को केवल प्लेसमेंट की नहीं, बल्कि वैकल्पिक करियर और स्किल ट्रेनिंग की जानकारी भी दे।
3. राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल करियर पोर्टल
भारत सरकार एक मल्टी-लैंग्विज करियर गाइडेंस पोर्टल बनाए, जिसमें न केवल कोर्स की जानकारी हो बल्कि भविष्य के स्कोप, स्किल्स, सैलरी ट्रेंड्स और ऑनलाइन काउंसलिंग भी उपलब्ध हो।
4. शिक्षकों और अभिभावकों का पुनर्प्रशिक्षण
शिक्षकों और माता-पिता को भी करियर गाइडेंस के मूल सिद्धांतों की ट्रेनिंग दी जाए ताकि वे बच्चों को सही दिशा दे सकें।
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💡 निष्कर्ष
भारत में करियर गाइडेंस की विफलता सिर्फ शिक्षा प्रणाली की समस्या नहीं है, यह सामाजिक सोच, नीतिगत खामियों और स्किल गैप की एक जटिल कहानी है। जब तक छात्र अपने aptitude और मार्केट ट्रेंड के अनुसार कोर्स नहीं चुनते, तब तक डिग्री और रोजगार के बीच की खाई नहीं पाटी जा सकती।
हमें एक स्कूल से नौकरी तक की स्पष्ट करियर गाइडेंस श्रृंखला विकसित करनी होगी — नहीं तो भारत की युवा आबादी, जो हमारा सबसे बड़ा संसाधन है, बेरोजगारी और दिशाहीनता में खो जाएगी।

