थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 ने दक्षिण-पूर्व एशिया की शांति को गंभीर चुनौती दी है। जानिए इस विवाद की जड़, हालिया घटनाक्रम और इसके संभावित वैश्विक प्रभाव।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 क्या है?
थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 एक ऐसा नया क्षेत्रीय विवाद है जिसने दक्षिण-पूर्व एशिया की भौगोलिक राजनीति को हिला कर रख दिया है। जुलाई 2025 में, दोनों देशों के सीमावर्ती क्षेत्रों में अचानक हिंसक झड़पें शुरू हुईं, जिनमें अब तक दर्जनों सैनिक घायल हुए हैं और सैकड़ों नागरिकों को विस्थापित होना पड़ा है।
थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 का सीधा असर न केवल इन दो देशों के द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ा है, बल्कि ASEAN की क्षेत्रीय स्थिरता, वैश्विक निवेश और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े हुए हैं।
संघर्ष की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद कोई नया मुद्दा नहीं है। इसका इतिहास 1904 से जुड़ा है, जब फ्रांस और सियाम (अब थाईलैंड) के बीच सीमांकन हुआ था। विवाद का सबसे संवेदनशील बिंदु प्रेह विहेयर मंदिर है, जो UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी है और दोनों देश उस क्षेत्र पर दावा करते हैं।
2011 में भी इसी स्थान पर सैन्य संघर्ष हुआ था, लेकिन 2025 की झड़पें कहीं अधिक संगठित, घातक और रणनीतिक हैं। इस बार दोनों पक्षों ने UAV ड्रोन, भारी तोपें और सैटेलाइट निगरानी का उपयोग किया है।
हालिया घटनाक्रम: क्या है नया?
जुलाई 2025 के दूसरे सप्ताह में, कंबोडिया ने आरोप लगाया कि थाईलैंड की सेना ने सीमा पार कर “चोमका लैंग” गांव पर कब्जा किया। इसके जवाब में कंबोडिया की सेना ने सैन्य अभियान चलाया और “थैप पहाड़ी” पर नियंत्रण की कोशिश की।
थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 इस मोड़ पर तब और गंभीर हो गया जब दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों ने आक्रामक बयान दिए और आपसी बातचीत से इनकार कर दिया।
ASEAN की चुप्पी और अंतरराष्ट्रीय चिंता
ASEAN (दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ) ने अब तक केवल औपचारिक बयान जारी किए हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सिंगापुर और वियतनाम जैसे सदस्य देश जल्द समाधान की मांग कर रहे हैं, लेकिन थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 के समाधान में चीन की भूमिका को लेकर संगठन बंटा हुआ नजर आ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र ने संघर्ष पर “गंभीर चिंता” जताई है, लेकिन अब तक सुरक्षा परिषद में कोई प्रस्ताव नहीं लाया गया है।
भारत की स्थिति और कूटनीतिक दुविधा
भारत ने अब तक तटस्थ रुख अपनाया है, लेकिन रणनीतिक रूप से उसकी स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के साथ भारत के रक्षा और आर्थिक संबंध हैं। साथ ही, थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 भारत की “Act East Policy” और हिंद-प्रशांत रणनीति के लिए एक बड़ा झटका है।
भारत ने अपने नागरिकों को सीमावर्ती क्षेत्रों से दूर रहने की सलाह दी है और वाणिज्य दूतावासों को सतर्क कर दिया गया है।
क्या यह संघर्ष और बड़ा रूप ले सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर ASEAN और संयुक्त राष्ट्र जल्दी हस्तक्षेप नहीं करते, तो थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 एक सीमित युद्ध में बदल सकता है। दोनों देशों के बीच लगातार बढ़ती सैन्य तैनाती और आक्रामक रणनीति इस संभावना को मजबूत करती है।
इसके अलावा, इस संघर्ष से क्षेत्रीय व्यापार, पर्यटन और आपूर्ति श्रृंखला पर भी व्यापक असर पड़ा है। विशेष रूप से, थाईलैंड और कंबोडिया के बीच की सड़क और रेल कनेक्टिविटी ठप हो गई है।
दक्षिण-पूर्व एशिया पर व्यापक असर
थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 से पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बन गया है। वियतनाम, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देश चिंतित हैं कि कहीं यह विवाद एक क्षेत्रीय विभाजन में न बदल जाए। साथ ही, चीन और अमेरिका जैसे बाहरी शक्तियां भी अब इस संकट में अपनी उपस्थिति दिखा सकती हैं।
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विश्लेषणात्मक निष्कर्ष
थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष 2025 केवल दो देशों का विवाद नहीं है; यह एक संकेत है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में सीमा रेखाएं अभी भी संवेदनशील हैं और वैश्विक भू-राजनीति से प्रभावित हो सकती हैं। इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, रणनीतिक गठबंधनों और मानवाधिकारों तक फैलेगा।
अगर ASEAN जैसे संगठन इस संघर्ष को सुलझाने में विफल रहे, तो यह क्षेत्रीय अस्थिरता की नींव डाल सकता है। भारत सहित कई देशों को अपनी पूर्वी नीति और सैन्य सतर्कता पर पुनर्विचार करना होगा।

