भूमिका:
ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भूमिका 2025: कोविड-19 महामारी और भू-राजनीतिक तनावों (जैसे अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर) ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) को पुनर्संगठित करने पर मजबूर कर दिया है। इस परिस्थिति ने “चीन प्लस वन” रणनीति को जन्म दिया, और भारत को एक संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
✍🏻 लेखक: रुपेश कुमार सिंह
“चीन प्लस वन” रणनीति क्या है?
यह रणनीति कंपनियों को चीन पर पूर्ण निर्भरता से हटाकर एक वैकल्पिक देश में भी निर्माण/सप्लाई केंद्र स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।
भारत के अवसर:
जनसांख्यिकीय लाभ: युवा कार्यबल और कम मजदूरी लागत
नीतिगत समर्थन: PLI Schemes (उत्पादन आधारित प्रोत्साहन), मेक इन इंडिया
विकसित होते लॉजिस्टिक हब: जैसे DFC (Dedicated Freight Corridors), बंदरगाहों का डिजिटलीकरण
प्रमुख सेक्टर जहाँ भारत उभर रहा है:
इलेक्ट्रॉनिक्स (Apple, Foxconn का भारत निवेश)
फार्मास्यूटिकल्स (Active Pharmaceutical Ingredients)
टेक्सटाइल और ऑटोमोटिव
चुनौतियाँ:
इन्फ्रास्ट्रक्चर: लॉजिस्टिक लागत अभी भी GDP का ~13% है, जबकि चीन में ~8%
नियामक जटिलताएँ: भूमि अधिग्रहण, श्रम कानून
स्किल्ड मैनपावर की उपलब्धता
भारत बनाम वियतनाम / मैक्सिको:
वियतनाम में प्रशासनिक प्रक्रियाएं सरल और तेज़ हैं, लेकिन भारत के पास विशाल घरेलू बाजार है जो अतिरिक्त लाभ देता है।
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निष्कर्ष:
भारत के पास ऐतिहासिक मौका है, परंतु इसके लिए सतत निवेश, सरकारी सहयोग और स्किल डेवलपमेंट जरूरी है। अगर यह संतुलन बनता है, तो 2025 तक भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बन सकता है।

